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डायन

डायन भारतीय परिप्रेक्ष्य में विशेषकर आदिवासी लोककथा में ऐसी स्त्री को कहते हैं जो जादू-टोना कर के दूसरों में बीमारी, मौत, अकाल लाना या कई और अनैतिक कार्य करती है। यह एक प्रकार का अंधविश्वास है। इस प्रकार से ये चुड़ैल से समानता रखता है। भारत में ज ...

                                               

धार्मिक भाषा

धार्मिक भाषा एक ऐसी भाषा होती है जिसे धार्मिक प्रयोगों के लिये इस्तेमाल किया जाता है। किसी धार्मिक भाषा का प्रयोग करने वाले अपने दैनिक जीवन में किसी अन्य भाषा का प्रयोग करते हैं और वह धार्मिक भाषा उनकी मातृभाषा नहीं होती। अक्सर श्रद्धालुओं की दृष ...

                                               

गिइज़ भाषा

गिइज़ अफ़्रीका के सींग में उत्तरी इथियोपिया और दक्षिणी एरिट्रिया के क्षेत्रों में उत्पन्न हुई एक प्राचीन सामी भाषा है। कभी यह अक्सुम राज्य और इथियोपिया के शाही दरबार की राजभाषा हुआ करती थी, लेकिन आधुनिक युग में इसका प्रयोग केवल कुछ क्षेत्रीय ईसाई ...

                                               

लातिन भाषा

लातीना प्राचीन रोमन साम्राज्य और प्राचीन रोमन धर्म की राजभाषा थी। आज ये एक मृत भाषा है, लेकिन फिर भी रोमन कैथोलिक चर्च की धर्मभाषा और वैटिकन सिटी शहर की राजभाषा है। ये एक शास्त्रीय भाषा है, संस्कृत की ही तरह, जिससे ये बहुत ज़्यादा मेल खाती है। ला ...

                                               

वैदिक संस्कृत

वैदिक संस्कृत २००० ईसापूर्व से लेकर ६०० ईसापूर्व तक बोली जाने वाली एक हिन्द-आर्य भाषा थी। यह संस्कृत की पूर्वज भाषा थी और आदिम हिन्द-ईरानी भाषा की बहुत ही निकट की संतान थी। उस समय फ़ारसी और संस्कृत का विभाजन बहुत नया था, इसलिए वैदिक संस्कृत और अव ...

                                               

सीरियाई भाषा

सीरियाई आरामाई भाषा की एक उपभाषा है जो किसी ज़माने में मध्य पूर्व में उर्वर अर्धचंद्र के अधिकतर इलाक़े में बोली जाती थी। इसके एक जीवित भाषा के रूप के बोले जाने के अंत के ५०० साल बाद भी यह पहली सदी ईसवी में एक लिखित भाषा के रूप में उभरी और इस क्षे ...

                                               

प्रार्थना

प्रार्थना एक धार्मिक क्रिया है जो ब्रह्माण्ड की किसी महान शक्ति से सम्बन्ध जोड़ने की कोशिश करती है। प्रार्थना व्यक्तिगत हो सकती है और सामूहिक भी। इसमें शब्दों का प्रयोग हो सकता है या प्रार्थना मौन भी हो सकती है। प्रार्थना में शरीर, मन व वाणी तीनो ...

                                               

नमस्ते सदा वत्सले

नमस्ते सदा वत्सले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना है। सम्पूर्ण प्रार्थना संस्कृत में है केवल इसकी अन्तिम पंक्ति हिन्दी में है। १९३९ में की थी। इसे सर्वप्रथम २३ अप्रैल १९४० को पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में गाया गया था। यादव राव जोशी ने इसे सुर ...

                                               

अभयानन्दा

अभयानन्दा अमेरेकी महिला एवं महिला स्वामी भिक्षु थीं जब विवेकानंद के मिशन का आरम्भ हुआ था। उनके पूर्व आश्रम का नाम मेर्री लुईस था। लुईस को विवेकानंद के द्वारा ही थाउसंड इज्लैंड पार्क में १९८५ में आरम्भ किया गया एवं उनका मठवासी नाम भी विवेकानन्द ने ...

                                               

गुरु-शिष्य परम्परा

गुरु-शिष्य परम्परा आध्यात्मिक प्रज्ञा का नई पीढ़ियों तक पहुंचाने का सोपान। भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत गुरु अपने शिष्य को शिक्षा देता है या कोई विद्या सिखाता है। बाद में वही शिष्य गुरु के रूप में दूसरों को शिक्षा देता है। य ...

                                               

केश (सिख धर्म)

केश सिख मजहब की एक प्रथा/व्यवहार है यह अवैज्ञानिक है क्योकी इससे लाल रक्त कण की कमी हो सकती है जिससे शरीर ठकावत महसूस करता है जिसेे हीमोग्लोबिन की कमी भी कहते है लेकिन सिख समुदाय इसे शरीर के लिए लाभदायक मानताा है । यह प्रथा पाँच ककार में से एक है ...

                                               

निरंकार

निरंकार का अर्थ है बिना आकार का और इसका उपयोग सिखों की पवित्र पुस्तक गुरु ग्रन्थ साहिब में ईश्वर को उद्घृत करने के लिए किया गया है। Nirankar sabad ka matab hota h jiska koi aakar nahi hota Prince Manoliya

                                               

सत श्री अकाल

सत श्री अकाल पंजाबी भाषा में प्रयुक्त एक अभिवादन है और इसका अधिकतर उपयोग सिखमत के अनुयाईयों द्वारा और कुछ पंजाबी हिन्दुओं द्वारा भी किया जाता है। इसका अर्थ इस प्रकार है सत यानी सत्य, श्री एक सम्मानसूचक शब्द है और अकाल का अर्थ है समय से रहित यानी ...

                                               

भारत भूषण (योगी)

भारत भूषण, जन्म: 30 अप्रैल 1952) एक भारतीय योग शिक्षक हैं। गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए उन्होंने पूर्णत: सन्यस्त भाव से देश-विदेश में योग को प्रचारित और प्रसारित करने का उल्लेखनीय कार्य किया। भारत सरकार ने सन १९९१ में उन्हें पद्म श्री की उपाधि से ...

                                               

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस

अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को मनाया जाता है। यह दिन वर्ष का सबसे लम्बा दिन होता है और योग भी मनुष्य को दीर्घ जीवन प्रदान करता है। पहली बार यह दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया, जिसकी पहल भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को सं ...

                                               

अग्निसार प्राणायाम

अग्निसार क्रिया प्राणायाम का एक प्रकार है। "अग्निसार क्रिया" से शरीर के अन्दर अग्नि उत्पन होती है, जो कि शरीर के अन्दर के रोगाणु को भस्म कर देती है। इसे प्लाविनी क्रिया भी कहते हैं।

                                               

अनाहत चक्र

अनाहत चक्र तंत्और योग साधना की चक्र संकल्पना का चौथा चक्र है। अनाहत का अर्थ है शाश्वत। यह चक्र हृदय के समीप सीने के मध्य भाग में स्थित है। इसका मंत्र यम है।

                                               

अर्ध-शलभासन

शलभ एक किट को कहते है और शलभ टिड्डे को भी। इस आसन में शरीर की आकृति कुछ इसी तरह की हो जाती है इसीलिए इसे शलभासन कहते है। एक पैर को ऊपर उठाने से इस आसन को अर्ध-शलभासन कहते है।

                                               

आसन

आसन का शाब्दिक अर्थ है- संस्कृत शब्दकोष के अनुसार आसनम् में इस क्रिया का स्थान तृतीय है जबकि गोरक्षनाथादि द्वारा प्रवर्तित षडंगयोग में आसन का स्थान प्रथम है। चित्त की स्थिरता, शरीर एवं उसके अंगों की दृढ़ता और कायिक सुख के लिए इस क्रिया का विधान म ...

                                               

इरा त्रिवेदी

ईरा त्रिवेदी एक भारतीय जन्म का लेखक, स्तंभकाऔर योग आचार्य है। उनके कार्यों में भारत में प्यार: 21 वीं सदी में विवाह और कामुकता, आप क्या बचाएंगे द वर्ल्ड? पेंगुइन बुक्स, द ग्रेट इंडियन प्यार को लिया गया क्या आप दुनिया को बचाने के लिए क्या करना होग ...

                                               

ईड़ा

कई योग शास्त्रों में ईड़ा को तीन प्रमुख नाड़ियों में से एक माना गया है। अन्य दो के नाम हैं - पिंगला और सुषुम्ना। ईड़ा ऋणात्मक ऊर्जा का वाह करती है। शिव स्वरोदय ईड़ा द्वारा उत्पादित ऊर्जा को चन्द्रमा के सदृश्य मानता है अतः इसे चन्द्रनाड़ी भी कहा ज ...

                                               

ईश्वरप्रणिधान

नियम, योग के आठ अंगों में से एक है और ईश्वरप्रणिधान पाँच नियमों में से एक है। ईश्वरप्रणिधान का अर्थ है - ईश्वर में भक्तिपूर्वक सब कर्मों का समर्पण करना ।

                                               

उत्कटासन

पैरों के पंजे भूमि पर टिके हुए हों तथा एड़ियों के ऊपर नितम्ब टिकाकर बैठ जाइए। दोनों हाथ घुटनों के ऊपर तथा घुटनों को फैलाकर एड़ियों के समानान्तर स्थिर करें।

                                               

उत्तानपादासन

पीठ के बल लेट जायें। हथेलियां भूमि की ओर, पैर सीधे, पंजे मिले हुए हो। अब श्वास अन्दर भरकर पैरों को 1 फुट तक धीरे-धीरे ऊपर उठाये, कुछ समय तक इसी स्थिति में बने रहे। वापस आते समय धीरे-धीरे पैरों को नीचे भूमि पर टिकायें, झटके के साथ नहीं। कुछ आराम क ...

                                               

उत्तानशीर्षासन

शवासन मे लेटकर दोनों पैरो को मोड़कर रखें। दोनों हाथ दोनों ओर पार्श्र्व में फैलाकर रखें। श्वास अन्दर भरते हुए पीठ को ऊपर की ओर खीचें। नितम्ब तथा कंधे भूमि पर टिके हुए होम। फिर श्वास छोड़ते हुए पीठ को नीचे भूमि पर दबाकर पूरा सीधा कर दें। इस प्रकार ...

                                               

कपालभाति (हठयोग)

कपालभाति योग में षट्कर्म की एक विधि है। संस्कृत में कपाल का अर्थ होता है माथा या ललाट और भाति का अर्थ है तेज। इस प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से मुख पर आंतरिक प्रभा से उत्पन्न तेज रहता है। कपाल भाति बहुत ऊर्जावान उच्च उदर श्वास व्यायाम है। कपा ...

                                               

कुण्डलिनी

योग सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के मेरुदंड के नीचे एक ऊर्जा संग्रहीत होती है जिसके जाग्रत होने पर स्वयंज्ञान की प्राप्ति होती है। इसका ज़िक्र उपनिषदों और शाक्त विचारधारा के अन्दर कई बार आया है। ऊर्जा का यह रूप एक सांप के साढ़े तीन कुंडली म ...

                                               

खसम

खसम, हठयोग साधना का एक पारिभाषिक शब्द जो ख + सम से बना है और इसका मूल अर्थ है ख के समान। हठयोग साधना का उद्देश्य चित्त को सारे सांसारिक धर्मों से मुक्तकर उसे निर्लिप्त बना देना था। इस सर्वधर्मशून्यता को मन की शून्यावस्था कहते हैं और शून्य का प्रत ...

                                               

खेचरी

खेचरी मुद्रा योगसाधना की एक मुद्रा है। इस मुद्रा में चित्त एवं जिह्वा दोनों ही आकाश की ओर केंद्रित किए जाते हैं जिसके कारण इसका नाम खेचरी पड़ा है । इस मुद्रा की साधना के लिए पद्मासन में बैठकर दृष्टि को दोनों भौहों के बीच स्थिर करके फिर जिह्वा को ...

                                               

गोमांस भक्षण

गोमांस भक्षण योगसाधना की एक मुद्रा है जिसमें जीभ को उलट कर तालू से लगाते हैं इसी को प्रतीकात्मक पद्धति में गोमांस-भक्षण भी कहते हें। गो का अर्थ है इन्द्रिय या जीभ और उसे उलटकर तालू से लगाना गोमांस भक्षण है।

                                               

गोरक्षशतक

गोरक्षशतक हठयोग का ग्रन्थ है। इसके रचयिता गुरु गोरखनाथ हैं। यह ग्रन्थ हठयोग का सम्भवतः सबसे प्राचीन उपलब्ध ग्रन्थ है। गोरक्षशतक में १०१ श्लोक हैं जिनमें आसन, प्राण-संरोध प्राणायाम, मुद्रा तथा जपेदोंकार ओंकार का जाप का वर्णन है। इसके अलावा योग के ...

                                               

गौमुखासन

गौमुख का अर्थ होता है गाय का मुख अर्थात अपने शरीर को गौमुख के समान बना लेने के कारण ही इस आसन को गौमुखासन कहा जाता है। गौमुखासन तीन शब्दों की संधि से बना है - गौ + मुख + आसन।

                                               

घेरण्ड संहिता

घेरण्डसंहिता हठयोग के तीन प्रमुख ग्रन्थों में से एक है। अन्य दो गर्न्थ हैं - हठयोग प्रदीपिका तथा शिवसंहिता। इसकी रचना १७वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में की गयी थी। हठयोग के तीनों ग्रन्थों में यह सर्वाधिक विशाल एवं परिपूर्ण है। इसमें सप्तांग योग की व् ...

                                               

चक्रासन

पीठ के बल लेटकर घुटनों को मोड़ीए। एड़ीयां नितम्बों के समीप लगी हुई हों। दोनों हाथों को उल्टा करके कंधों के पीछे थोड़े अन्तर पर रखें इससे सन्तुलन बना रह्ता है। श्वास अन्तर भरकर कटिप्रदेश एवं छाती को ऊपर उठाइये। धीरे-धीरे हाथ एवं पैरों को समीप लाने ...

                                               

ज्ञान योग

ज्ञान योग ज्ञान और स्वं का जानकारी प्राप्त करने को कहते है। ये अपनी और अपने परिवेश को अनुभव करने के माध्यम से समझना है। स्वामी विवेकानन्द के ज्ञानयोग सम्बन्धित व्याख्यान, उपदेशों तथा लेखों को लिपिबद्ध कर ज्ञानयोग पुस्तक में संकलित किया है। ज्ञान ...

                                               

तत्त्ववैशारदी

तत्त्ववैशारदी योग से सम्बन्धित एक संस्कृत ग्रन्थ है। यह वाचस्पतिमिश्र की कृति है जो व्यास भाष्य पर की टीका है। तत्त्ववैशारदी को सुस्पष्ट करने के लिये इस पर भी टीका मिलता है जिसका नाम पातंजलरहस्य है तथा इसके रचयिता राघवानन्द सरस्वती हैं।

                                               

त्रिकोणासन

दोनो पैरो के बीच लगभग डेड़ फुट का अन्दर रखते हुए सिधे खड़े हो जावें। दोनों हाथ कन्ढों के समानान्तर पार्श्र्व भाग में खुले हुए हो। श्वास अन्दर भरत हुए बायें हाथ को सामने लेत हुए बायें पंजे के पास भूमि पर ट्का दे, अथव हाथ को एड़ी के पास लगायें तथा ...

                                               

धनुरासन

धनुरासन से पेट की चरबी कम होती है। इससे सभी आंतरिक अंगों, माँसपेशियों और जोड़ों का व्यायाम हो जाता है। गले के तमाम रोग नष्ट होते हैं। पाचनशक्ति बढ़ती है। श्वास की क्रिया व्यवस्थित चलती है। मेरुदंड को लचीला एवं स्वस्थ बनाता है। सर्वाइकल, स्पोंडोला ...

                                               

धारणा

चित्त को किसी एक विचार में बांध लेने की क्रिया को धारणा कहा जाता है। यह शब्द धृ धातु से बना है। पतंजलि के अष्टांग योग का यह छठा अंग या चरण है। वूलफ मेसिंग नामक व्यक्ति ने धारणा के सम्बन्ध में प्रयोग किये थे।

                                               

धौति

धौति, षट्कर्म का एक प्रमुख विधि है। धौति ग्रास और पेट का शुद्धिकरण इस विधि को गज-कर्ण के नाम से भी जाना जाता है। गज हाथी को कहते हैं। जब हाथी को अपने पेट में उबकायी आती है, तब वह अपनी ग्रीवा में सूंड अंदर तक डाल देता है और पेट के अंदर की वस्तुओं ...

                                               

ध्यान (क्रिया)

ध्यान एक क्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने मन को चेतना की एक विशेष अवस्था में लाने का प्रयत्न करता है। ध्यान का उद्देश्य कोई लाभ प्राप्त करना हो सकता है या ध्यान करना अपने-आप में एक लक्ष्य हो सकता है। ध्यान से अनेकों प्रकार की क्रियाओं का बोध होता है ...

                                               

ध्यान (योग)

ध्यान हिन्दू धर्म, भारत की प्राचीन शैली और विद्या के सन्दर्भ में महर्षि पतंजलि द्वारा विरचित योगसूत्र में वर्णित अष्टांगयोग का एक अंग है। ये आठ अंग यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि है। ध्यान का अर्थ किसी भी एक विषय की ...

                                               

नटराजन आसन

पूर्ववत् खड़े होकर दायें पैर को पीछे की ओर मोड़िए। दायें हाथ कन्धे के ऊपर से लेकर दायें पैर का अंगुठा पकड़िए। बायां हाथ सामने सीधा ऊपर की ओर उठा हुआ होगा। इस पैर से करने के पश्चात दूसरे पैर से इसी प्रकार करें।

                                               

नाड़ी (योग)

योग के सन्दर्भ में नाड़ी वह मार्ग है जिससे होकर शरीर की ऊर्जा प्रवाहित होती है। योग में यह माना जाता है कि नाडियाँ शरीर में स्थित नाड़ीचक्रों को जोड़तीं है। कई योग ग्रंथ १० नाड़ियों को प्रमुख मानते हैं। इनमें भी तीन का उल्लेख बार-बार मिलता है - ई ...

                                               

नादयोग

नाद का शाब्दिक अर्थ है -१. शब्द, ध्वनि, आवाज। संगीत के आचार्यों के अनुसार आकाशस्थ अग्नि और मरुत् के संयोग से नाद की उत्पत्ति हुई है। जहाँ प्राण वायु की स्थिति रहती है उसे ब्रह्मग्रंथि कहते हैं। संगीतदर्पण में लिखा है कि आत्मा के द्वरा प्रेरित होक ...

                                               

नियम

योग के सन्दर्भ में, स्वस्थ जीवन, आध्यात्मिक ज्ञान, तथा मोक्ष की प्राप्ति के लिये आवश्यक आदतों एवं क्रियाकलापों नियम को कहते हैं। महर्षि पतंजलि द्वारा योगसूत्र में वर्णित पाँच नियम- सन्तोष तपस शौच ईश्वरप्रणिधान स्वाध्याय हठयोगप्रदीपिका में वर्णित ...

                                               

निर्बीज समाधि

पतंजलि योगसूत्र में निर्बीज समाधि एक विशेष प्रकार की समाधि है। निर्विकल्प समाधि इससे सम्बन्धित है किन्तु दोनों समान नहीं हैं। तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः॥ योगसूत्र १/५१ भावार्थ- जब सारे नियंत्रणों पर का नियंत्रण पाकर लिया जाता है, ...

                                               

नौकासन

नौका आसन: इस आसन की अंतिम अवस्था में हमारे शरीर की आकृति नौका समान दिखाई देती है, इसी कारण इसे नौकासन कहते है। इस आसन की गिनती पीठ के बल लेटकर किए जाने वाले आसनों में मानी जाती है।

                                               

पंचकोश

योग की धारणा के अनुसार मानव का अस्तित्व पाँच भागों में बंटा है जिन्हें पंचकोश कहते हैं। ये कोश एक साथ विद्यमान अस्तित्व के विभिन्न तल समान होते हैं। विभिन्न कोशों में चेतन, अवचेतन तथा अचेतन मन की अनुभूति होती है। प्रत्येक कोश का एक दूसरे से घनिष् ...

                                               

पतञ्जलि

ये गोनर्द के निवासी थे, बाद में वे काशी में बस गए, इनकी माता का नाम गोणिका था! पतंजलि योगसूत्र के रचनाकार है जो हिन्दुओं के छः दर्शनों में से एक है। भारतीय साहित्य में पतंजलि के लिखे हुए ३ मुख्य ग्रन्थ मिलते हैः योगसूत्र, अष्टाध्यायी पर भाष्य और ...