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सन्धिमन्

हर्नामदेव | सुल्कन्देव | सिंहदेव | गोपालदेव | विजयनन्द | सुखदेव | रामन्देव सन्धिमन् | मरहन्देव | चन्द्रदेव | आनन्ददेव | द्रुपददेव परीक्षित २ |हर्णदेव | रामदेव | व्यासदेव * द्रौनदेव जनमेजय ३ | शतानीक १ | अश्वमेधदत्त बृहद्रथ | वसुदान |शत्निक बुद्ध ...

                                               

सिंहदेव

सिंहदेव | गोपालदेव | विजयनन्द | सुखदेव | रामन्देव परीक्षित २ |हर्णदेव | रामदेव | व्यासदेव * द्रौनदेव सन्धिमन् | मरहन्देव | चन्द्रदेव | आनन्ददेव | द्रुपददेव हर्नामदेव | सुल्कन्देव | वृष्णिमत् | सुषेण | सुनीथ | रुच | नृचक्षुस् अधिसीमकृष्ण | निचक्षु ...

                                               

सुखदेव(राजा)

इसी नाम से प्रसिद्ध एक भारतीय क्रांतिकारी के बारे में जानने के लिए यहां जाँय - सुखदेव महाभारत के पश्चात के कुरु वंश के राजा। कलियुग वंशावली यह प्राचीन भारत के सूर्यवंश-चन्द्रवंश के प्रसिद्ध राजा थे। भारतीय इतिहास अति प्राचीन है। पौराणिक वंशावली अ ...

                                               

सुखीबल

सन्धिमन् | मरहन्देव | चन्द्रदेव | आनन्ददेव | द्रुपददेव सिंहदेव | गोपालदेव | विजयनन्द | सुखदेव | रामन्देव परीक्षित २ |हर्णदेव | रामदेव | व्यासदेव * द्रौनदेव हर्नामदेव | सुल्कन्देव | बृहद्रथ | वसुदान |शत्निक बुद्ध कालीन| जनमेजय ३ | शतानीक १ | अश्वम ...

                                               

सुनय

परीक्षित २ |हर्णदेव | रामदेव | व्यासदेव * द्रौनदेव हर्नामदेव | सुल्कन्देव | सिंहदेव | गोपालदेव | विजयनन्द | सुखदेव | रामन्देव सन्धिमन् | मरहन्देव | चन्द्रदेव | आनन्ददेव | द्रुपददेव उदयन | अहेनर | निरमित्र खान्दपनी |क्षेमक वृष्णिमत् | सुषेण | सुनी ...

                                               

सुनीथ

हर्नामदेव | सुल्कन्देव | सन्धिमन् | मरहन्देव | चन्द्रदेव | आनन्ददेव | द्रुपददेव परीक्षित २ |हर्णदेव | रामदेव | व्यासदेव * द्रौनदेव सिंहदेव | गोपालदेव | विजयनन्द | सुखदेव | रामन्देव बृहद्रथ | वसुदान |शत्निक बुद्ध कालीन| वृष्णिमत् | सुषेण | सुनीथ | ...

                                               

सुल्कन्देव

हर्नामदेव | सुल्कन्देव | सन्धिमन् | मरहन्देव | चन्द्रदेव | आनन्ददेव | द्रुपददेव सिंहदेव | गोपालदेव | विजयनन्द | सुखदेव | रामन्देव परीक्षित २ |हर्णदेव | रामदेव | व्यासदेव * द्रौनदेव सुखीबल | परिप्लव | सुनय | मेधाविन् | नृपञ्जय | ध्रुव, मधु|तिग्म्ज ...

                                               

सुव्रत

सन्धिमन् | मरहन्देव | चन्द्रदेव | आनन्ददेव | द्रुपददेव हर्नामदेव | सुल्कन्देव | परीक्षित २ |हर्णदेव | रामदेव | व्यासदेव * द्रौनदेव सिंहदेव | गोपालदेव | विजयनन्द | सुखदेव | रामन्देव वृष्णिमत् | सुषेण | सुनीथ | रुच | नृचक्षुस् जनमेजय ३ | शतानीक १ | ...

                                               

सेनाजित्

हर्नामदेव | सुल्कन्देव | परीक्षित २ |हर्णदेव | रामदेव | व्यासदेव * द्रौनदेव सिंहदेव | गोपालदेव | विजयनन्द | सुखदेव | रामन्देव सन्धिमन् | मरहन्देव | चन्द्रदेव | आनन्ददेव | द्रुपददेव बृहद्रथ | वसुदान |शत्निक बुद्ध कालीन| उदयन | अहेनर | निरमित्र खान ...

                                               

सोमाधि

हर्नामदेव | सुल्कन्देव | सिंहदेव | गोपालदेव | विजयनन्द | सुखदेव | रामन्देव परीक्षित २ |हर्णदेव | रामदेव | व्यासदेव * द्रौनदेव सन्धिमन् | मरहन्देव | चन्द्रदेव | आनन्ददेव | द्रुपददेव अधिसीमकृष्ण | निचक्षु | उष्ण | चित्ररथ | शुचिद्रथ बृहद्रथ | वसुदा ...

                                               

हर्णदेव

सिंहदेव | गोपालदेव | विजयनन्द | सुखदेव | रामन्देव परीक्षित २ |हर्णदेव | रामदेव | व्यासदेव * द्रौनदेव हर्नामदेव | सुल्कन्देव | सन्धिमन् | मरहन्देव | चन्द्रदेव | आनन्ददेव | द्रुपददेव जनमेजय ३ | शतानीक १ | अश्वमेधदत्त वृष्णिमत् | सुषेण | सुनीथ | रुच ...

                                               

हर्नामदेव

सन्धिमन् | मरहन्देव | चन्द्रदेव | आनन्ददेव | द्रुपददेव सिंहदेव | गोपालदेव | विजयनन्द | सुखदेव | रामन्देव परीक्षित २ |हर्णदेव | रामदेव | व्यासदेव * द्रौनदेव हर्नामदेव | सुल्कन्देव | बृहद्रथ | वसुदान |शत्निक बुद्ध कालीन| जनमेजय ३ | शतानीक १ | अश्वम ...

                                               

एक-रत्न

एक-रत्न, मंदिर वास्तुकला की एक शैली है जो बंगाल में विकसित हुई। इस शैली के मन्दिरों के नीचे वाला भाग चार-चाला मंदिरों जैसा ही होता है किन्तु इसकी छत बिल्कुल अलग होती है। यह रत्न मंदिरों की सरलतम शैली है। पंचरत्न तथा नवरत्न, एकरत्न की अपेक्षा अधिक ...

                                               

कटारमल सूर्य मन्दिर

कटारमल सूर्य मन्दिर भारतवर्ष का प्राचीनतम सूर्य मन्दिर है। यह पूर्वाभिमुखी है तथा उत्तराखण्ड राज्य में अल्मोड़ा जिले के अधेली सुनार नामक गॉंव में स्थित है। इसका निर्माण कत्यूरी राजवंश के तत्कालीन शासक कटारमल के द्वारा छठीं से नवीं शताब्दी में हुआ ...

                                               

गुप्तेश्वर महादेव, उदयपुर

गुप्तेश्वर महादेव मंदिर शहर के एक दूरस्थ पक्ष में स्थित है, जो घनी बस्ती में बसा हुआ है। हालांकि शहर के केंद्र सूरजपोल से केवल किलोमीटर और उदयपुर शहर के रेलवे स्टेशन से ७.५ किलोमीटर दूर है। आगंतुक निजी वाहन, या टैक्सी या ऑटो-रिक्शा द्वारा मंदिर प ...

                                               

गोला गोकर्णनाथ

गोला गोकर्णनाथ छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध, भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के लखीमपुर खीरी जिले में स्थित यह नगर पालिका परिषद व तहसील भगवान शिव के मंदिऔर बजाज हिन्दुस्तान लिमिटेड के चीनी मिल के लिए जाना जाता है। गोली गांव जो कि शिव मंदिर से कुछ दूरी ...

                                               

दन्तेश्वरी मन्दिर

दन्तेश्वरी मन्दिर छत्तीसगढ़ के दन्तेवाड़ा में स्थित एक शक्तिपीठ है जो दन्तेश्वरी देवी को समर्पित है। इस मन्दिर का निर्माण १४वीं शताब्दी में हुआ था। दन्तेवाड़ा का नाम देवी दन्तेश्वरी के नाम पर ही पड़ा है जो काकतीय राजाओं की कुलदेवी हैं। परम्परागत ...

                                               

पारसमणिनाथ मंदिर

पारसमणिनाथ मंदिर पारसमणिधाम रहुआ-संग्राम के रूप में भी जाना जाता है। यह एक प्रसिद्ध शिव के लिए समर्पित हिंदू मंदिर है जो रहुआ-संग्राम गांव के उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित है। जो बिहार के मधुबनी जिला अंतर्गत मधेपुर प्रखण्ड कार्यालय से छह किलोमीटर की ...

                                               

बादामी गुफा मंदिर

बादामी गुफा मंदिर, भारत के कर्नाटक के उत्तरी भाग में बागलकोट जिले के एक शहर बादामी में स्थित हिंदू और जैन गुफा मंदिरों का एक परिसर है। गुफाओं को भारतीय चट्टानों को काटकर बनाने की वास्तुकला का उदाहरण माना जाता है, विशेष रूप से बादामी चालुक्य वास्त ...

                                               

श्रीगोधाम महातीर्थ पथमेड़ा

आनंदवन पथमेड़ा भारत देश की वह पावन व मनोरम भूमि हैं जिसे भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र सें द्वारका जाते समय श्रावण भादों माह में रुक कर वृंदावन से लायी हुई भूमंड़ल की सर्वाधिक दुधारु जुझारु साहसी शौर्यवान सौम्यवान गायों के चरने व विचरनें के लिए ...

                                               

संतोषी माता मन्दिर बदौवां

माँ संतोषी का यह दिव्य मन्दिर भारतवर्ष में उत्तर प्रदेश राज्य के जनपद जौनपुर के अन्तर्गत मड़ियाहूँ तहसील के बदौवां ग्राम में स्थित है। माँ का यह मन्दिर वर्तमान में देखने में बहुत लम्बा चौड़ा तो नहीं परन्तु सम्पूर्ण क्षेत्रवासियों के लिए यह सदा से ...

                                               

२०१० हरिद्वार महाकुम्भ

महाकुम्भ भारत का एक प्रमुख उत्सव है जो ज्योतिषियों के अनुसार तब आयोजित किया जाता है जब बृहस्पति कुंभ राशि में प्रवेश करता है। कुम्भ का अर्थ है घड़ा। यह एक पवित्र हिन्दू उत्सव है। यह भारत में चार स्थानो पर आयोजित किया जाता है: प्रयाग, हरिद्वार, उज ...

                                               

क्षत्रिय

क्षत्रिय, क्षत्र, राजन्य - ये चारों शब्द सामान्यतः हिंदू समाज के द्वितीय वर्ण और जाति के अर्थ में व्यवहृत होते हैं किन्तु विशिष्ठ एतिहासिक अथवा सामाजिक प्रसंग में पारिपाश्वों से संबंध होने के कारण इनके अपने विशेष अर्थ और ध्वनियां हैं। किंतु बाद म ...

                                               

सूत (जाति)

सूत प्राचीन भारतीय वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत एक जाति का नाम है। इसे वर्णसंकर जाति के रूप में मान्यता प्राप्त है। लोम और बिलोंम् से जाना जाता है। "लोम" यानि छत्रिय रज, और ब्राह्मण बीर्य से उत्पन्न हो तो उसे लोम जातिका सूत माना जाता है । ठीक विपरीत ...

                                               

विक्रम संवत

विक्रम संवत् एक प्राचीन हिन्दू कालगणना प्रणाली है जो भारतीय उपमहाद्वीप्प में प्रचलित रही है। यह भारत का सास्कृतिक आधिकारिक पञ्चांग है। भारत में यह अनेकों राज्यों में प्रचलित पारम्परिक पञ्चाङ्ग है। इसमें चान्द्र मास एवं सौर नाक्षत्र वर्ष का उपयोग ...

                                               

स्वामी कर्मवीर

योगनिष्ठ स्वामी कर्मवीर जी महाराज महर्षि पतंजलि अंतर्राष्ट्रीय योग विद्यापीठ के संस्थापक हैं। स्वामी कर्मवीर विश्व के प्रथम व्यक्ति हैं जिन्हें गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार, भारत द्वारा योग में मास्टर्स डिग्री से सम्मानित किया गया. उन् ...

                                               

अन्नमय कोश

अन्नमय कोश वेदों में वर्णित शरीर का ही पांच में से एक प्रकार है। वेद में सृष्टि की उत्पत्ति, विकास, विध्वंस और आत्मा की गति को पंचकोश के क्रम में समझाया गया है। पंचकोश इस प्रकार से होते हैं: अन्नमय प्राणमय मनोमय आनंदमय विज्ञानमय उक्त पंचकोश को ही ...

                                               

आश्वलायन

ऋग्वेद की 21 शाखाओं में से आश्वलायन अन्यतम शाखा है जिसका उल्लेख चरणव्यूह में किया गया है। इस शाखा के अनुसार न तो आज ऋक्‌संहिता ही उपलब्ध है और न कोई ब्राह्मण ही, परंतु कवींद्राचार्य की ग्रंथसूची में उल्लिखित होने से इन ग्रंथों के अस्तित्व का स्पष ...

                                               

उद्गाता

उद्गाता का अर्थ है, उच्च स्वर से गानेवाला। सोमयज्ञों के अवसर पर साम या स्तुति मंत्रों के गाने का कार्य उद्गाता का अपना क्षेत्र है। उसके लिए उपुयक्त मंत्रों का संग्रह साम संहिता में किया गया है। ये ऋचाएँ ऋग्वेद से ही यहाँ संगृहीत की गई हैं और इन्ह ...

                                               

उद्गीथाचार्य

उद्गीथाचार्य ऋग्वेद के प्रमुख भाष्यकारों में एक थे। आचार्य उद्गीथ सायणाचार्य के पूर्ववर्ती थे। इनका निवास कर्नाटक के निकट था। आचार्य सायण ने अपने भाष्य में इनकी व्याख्या का उपयोग किया है।

                                               

उवट

उवट विख्यात वेद-भाष्यकार थे। आचार्य उवट कृत यजुर्वेद के मन्त्रभाष्य द्वारा विदित होता है कि इनके पिता का नाम वज्रट था। साथ ही वहीं इनका जन्मस्थान आनन्दपुर कहा गया है: आनन्दपुरवास्तव्यवज्रटाख्यस्य सूनुना। मन्त्रभाष्यमिदं कृत्स्नं पदवाक्यै: सुनिश्च ...

                                               

ऋग्भाष्य-पदार्थ-कोष

ऋग्भाष्य-पदार्थ-कोष प्रो॰ ज्ञानप्रकाश शास्त्री द्वारा सम्पादित ऋग्वेद के पदों का एक ऐसा विश्वकोशात्मक शब्दकोश है जिसमें ऋग्वेद के पदों को अकारादि क्रम से रखते हुए महर्षि यास्क से लेकर स्वामी दयानन्द सरस्वती तक भारतवर्ष के समस्त प्रख्यात भाष्यकारो ...

                                               

ऋग्वेद

सनातन धर्म का सबसे आरम्भिक स्रोत है। इसमें १० मंडल, १०२८ सूक्त और १०६२७ मन्त्र हैं, मन्त्र संख्या के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद है। मंत्रों में देवताओं की स्तुति की गयी है। इसमें देवताओं का यज्ञ में आह्वान करने के लिये मन्त्र हैं। यही सर्वप ...

                                               

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा प्रणीत ग्रन्थ है। महर्षि ने वेद और वेदार्थ के प्रति अपने मन्तव्य को स्पष्टरूप से प्रतिपादित करने के लिये इस ग्रन्थ का का प्रणयन किया है। महर्षि ने सत्यार्थ-प्रकाश को जहाँ मूलतः हिन्दी में लिखा है ...

                                               

खिलानि

ऋग्वेद के उन ९८ अनाम मंत्रों के समूह को खिलानि कहते हैं जो वाष्कल शाखा में विद्यमान हैं किन्तु शाकल शाखा में नहीं। ऐसा माना जाता है कि ये ऋग्वेद में बाद में जोड़े गये किन्तु फिर भी वैदिक संस्कृत के मंत्रकाल के हैं।

                                               

गन्धर्व वेद

गंधर्व वेद चार उपवेदों में से एक उपवेद है। अन्य तीन उपवेद हैं - आयुर्वेद, शिल्पवेद और धनुर्वेद। गन्धर्ववेद के अन्तर्गत भारतीय संगीत, शास्त्रीय संगीत, राग, सुर, गायन तथा वाद्य यन्त्र आते हैं।

                                               

गोभिल

गोभिल धर्मशास्त्रीय क्षेत्र के एक ऋषि थे। इनका संबंध सामवेद से माना जाता है। वैदिकों में यह प्रसिद्धि है कि इस वेद की कौथुमशाखा का गृह्यसूत्र गोभिल गृह्यसूत्र है। यह भी अस प्रसंग में विचार्य है कि हेमाद्रि ने श्राद्ध कल्प में गोभिल का राणायनीय सू ...

                                               

चरनदास

चरनदास एक योगध्यान साधक का नाम है, जिनका जन्म सन १७३० ई. के लगभग हुआ था, इन्होने एक सम्प्रदाय की स्थापना की थी, जिसे "चरनदासी" सम्प्रदाय कहा जाता है, इस सम्प्रदाय का आधार कबीरदासी सम्प्रदाय के समान है, इन्होने धर्मोपदेश अनेक हिन्दी कविता ग्रन्थों ...

                                               

तैत्तिरीय शाखा

तैत्तिरीय शाखा कृष्ण यजुर्वेद की प्रमुख शाखा है। विष्णुपुराण के अनुसार इस शाखा के प्रवर्तक यक्ष के शिष्य तित्तिरि ऋषि थे। यह शाखा दक्षिण भारत में अधिक प्रचलित है। यह शाखा अपने में परिपूर्ण कही जा सकती है क्योंकि इस शाखा के संहिता, ब्राह्मण, आरण्य ...

                                               

दशम मण्डल

ऋग्वेद संहिता में कुल दस मण्डल हैं। दशम मण्डल सबसे अर्वाचीन है। इसमें १९१ सूक्त हैं। त्रित, विमद, इन्द्र, श्रद्धा, कामायनी, इन्द्राणी, शची आदि मुख्य ऋषि हैं। पुरुषसूक्त, नासदीय सूक्त, हिरण्यगर्भ सूक्त, संज्ञानसूक्त, विवाहसूक्त, अक्ष सूक्त आदि प्र ...

                                               

दानस्तुति

ऋग्वेद में कतिपय ऐसे सूक्त तथा मंत्र हैं, जिनकी संज्ञा दानस्तुति है। दानस्तुति का शाब्दिक अर्थ है दान की प्रशंसा में गागए मंत्र। व्यापक अर्थ में दान के उपलब्ध में राजाओं तथा यज्ञ के आश्रयदाताओं की स्तुति में ऋषियों द्वारा गागई ऋचाएँ दानस्तुति हैं ...

                                               

देवराज यज्वा

देवराज यज्वा निघंटु के व्याख्याकार। इनके भाष्य का वास्तविक नाम निघंटुनिर्वचन है जो तत्कालीन निघंटु ग्रंथ के स्वरूप को परिचित कराने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। प्राचीन उपलब्ध निघंटु के निर्वचनकार होने के नाते देवराज यज्वा का नाम उल्लेखनीय है।

                                               

धनुर्वेद

धनुर्वेद एक उपवेद है। इसके अन्तर्गत धनुर्विद्या या सैन्य विज्ञान आता है। दूसरे शब्दों में, धनुर्वेद, भारतीय सैन्य विज्ञान का दूसरा नाम है। शास्त्रों के अनुसार चार वेद हैं और इसी तरह चार उपवेद हैं। इन उपवेदों में पहला आयुर्वेद है। दूसरा शिल्प वेद ...

                                               

नासदीय सूक्त

नासदीय सूक्त ऋग्वेद के 10 वें मंडल का 129 वां सूक्त है। इसका सम्बन्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान और ब्रह्मांड की उत्पत्ति के साथ है। माना जाता है की यह सूक्त ब्रह्माण्ड के निर्माण के बारे में काफी सटीक तथ्य बताता है। इसी कारण दुनिया में काफी प्रसिद्ध हुआ ...

                                               

पंचम वेद

पंचम वेद की संकल्पना बहुत प्राचीन है। वैदिक काल के उपरान्त कई ग्रन्थों को पंचम वेद के रूप में मानने और उसे भी वेदों जैसा महत्व देने की बात कही गई है। यह बात सबसे पहले उपनिषदों में आई है और उसके बाद अनेक नए संस्कृत और अन्य नवीन भारतीय भाषाओं के ग् ...

                                               

पुनर्गमनवाद

पुनर्गमनवाद एक दार्शनिक दृष्टिकोण है जिससे याथार्थ्य की विवेचना भारतीय परम्परा में होती है। पुनर्गमन का अर्थ विधान अथवा व्यवस्था के रूप का विभिन्न स्थानों पर उत्थान। इसका उत्गम वेद के महावाक्य यद् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे है। एक ही समय पूरे ब्रह्मा ...

                                               

पुरुष सूक्त

पुरुषसूक्त ऋग्वेद संहिता के दसवें मण्डल का एक प्रमुख सूक्त यानि मंत्र संग्रह है, जिसमें एक विराट पुरुष की चर्चा हुई है और उसके अंगों का वर्णन है। इसको वैदिक ईश्वर का स्वरूप मानते हैैं । विभिन्न अंगों में चारो वर्णों, मन, प्राण, नेत्र इत्यादि की ब ...

                                               

प्राकृतिक न्याय का सिद्धान्त

संसार में जो भी पैदा हो रहा है, वह एक दूसरे को खा रहा है, पौधा जमीन के अन्दर की कोशिकाओं को खाकर बढ रहा है, पौधे को जानवर खा रहा है, और जानवर को मनुष्य या जानवर ही खा रहा है, कुछ को अपने को खिलाकर ही मजा आता है, और किसी को अपने को खिलाने पर दुख ह ...

                                               

बृहद्देवता

बृहद्देवता संस्कृत में छंदशास्त्र का एक प्राचीन ग्रंथ है। इसके रचयिता शौनक माने जाते हैं। एक प्राचीन ग्रन्थ है, जिसका रचनाकार शौनक को माना जाता है। 6 वेदांगों के अतिरिक्त वेदों के ऋषि देवता, छन्पद आदि के विषय में जो ग्रन्थ लिखे गये हैं, उनमें यह ...

                                               

बौधायन श्रौतसूत्र

बौधायन श्रौतसूत्र एक प्रमुख श्रौतसूत्र ग्रन्थ है। इसका सम्बन्ध कृष्ण यजुर्वेद की तैतरीय शाखा से है। आधुनिक युग में इसका प्रकाशन १९०४-२३ ई में बंगाल की एशियाटिक सोसायटी द्वारा किया गया।