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कुंतक

कुंतक, अलंकारशास्त्र के एक मौलिक विचारक विद्वान थे। ये अभिधावादी आचार्य थे जिनकी दृष्टि में अभिधा शक्ति ही कवि के अभीष्ट अर्थ के द्योतन के लिए सर्वथा समर्थ होती है। इनका काल निश्चित रूप से ज्ञात नहीं हैं। किंतु विभिन्न अलंकार ग्रंथों के अंत:साक्ष ...

                                               

कुमारसंभवम्

कुमारसम्भवम् महाकवि कालिदास विरचित कार्तिकेय के जन्म से संबंधित महाकाव्य जिसकी गणना संस्कृत के पंच महाकाव्यों में की जाती है। इस महाकाव्य में अनेक स्थलों पर स्मरणीय और मनोरम वर्णन हुआ है। हिमालयवर्णन, पार्वती की तपस्या, ब्रह्मचारी की शिवनिंदा, वस ...

                                               

चंपू

चम्पू श्रव्य काव्य का एक भेद है, अर्थात गद्य-पद्य के मिश्रित् काव्य को चम्पू कहते हैं। गद्य तथा पद्य मिश्रित काव्य को "चंपू" कहते हैं। गद्यपद्यमयं काव्यं चम्पूरित्यभिधीयते - साहित्य दर्पण ६ / ३३६ काव्य की इस विधा का उल्लेख साहित्यशास्त्र के प्राच ...

                                               

जगन्नाथ पण्डितराज

जगन्नाथ पण्डितराज, उच्च कोटि के कवि, समालोचक, साहित्यशास्त्रकार तथा वैयाकरण थे। कवि के रूप में उनका स्थान उच्च काटि के उत्कृष्ट कवियों में कालिदास के अनंतर - कुछ विद्वान् रखते हैं। "रसगंगाधर"कार के रूप में उनके साहित्यशास्त्रीय पांडित्य और उक्त ग ...

                                               

त्रिकालपरीक्षा

त्रिकालपरीक्षा आचार्य दिङ्नाग कृत संस्कृतभाषा में एक 33 कारिकाओं की लघुकाय परन्तु महत्वपूर्ण तत्वमीमांसीय रचना है। इसकी मूल संस्कृत पाण्डुलिपि को अभी तक खोजा नहीं जा सका है। चिंचोरे द्वारा भोटभाषा से संस्कृत में पुनः रचित पाठ उनके एक लेख के परिशि ...

                                               

धर्मशास्त्र विषयक ग्रन्थ

संस्कृत साहित्य में मनुष्य के आचार-व्यवहार-और सामाजिक मर्यादाओं के अनुपालन के लिए जो नीति-निर्देशक मानदंड निश्चित किये गए वे सब धर्मशास्त्र की विषयवस्तु हैं | संस्कृत का आदि साहित्य धर्मशास्त्र की दृष्टि से बड़ा संपन्न है| नीचे कुछ ऐसे ही ग्रंथों ...

                                               

नीतिशतकम्

नीतिशतकम् भर्तृहरि के तीन प्रसिद्ध शतकों जिन्हें कि शतकत्रय कहा जाता है, में से एक है। इसमें नीति सम्बन्धी सौ श्लोक हैं। नीतिशतक में भर्तृहरि ने अपने अनुभवों के आधापर तथा लोक व्यवहापर आश्रित नीति सम्बन्धी श्लोकों का संग्रह किया है। एक ओर तो उसने ...

                                               

नीलकण्ठ चतुर्धर

नीलकण्ठ चतुर्धर का जन्म महाराष्ट्र पूर्व में बंबई प्रांत के अहमदनगर जिले के कर्पूर ग्राम वर्तमान में कोपरगाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम गोविन्द सूरि तथा माता का नाम फुल्लाम्बिका था। ये गौतमगोत्रीय महाराष्ट्रीय ब्राह्मण थे, परन्तु इनके नाम के स ...

                                               

नैषधीयचरित

नैषधीयचरित, श्रीहर्ष द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य है। यह वृहत्त्रयी नाम से प्रसिद्ध तीन महाकव्यों में से एक है। महाभारत का नलोपाख्यान इस महाकाव्य का मूल आधार है।

                                               

पञ्चतन्त्र

संस्कृत नीतिकथाओं में पंचतंत्र का पहला स्थान माना जाता है। यद्यपि यह पुस्तक अपने मूल रूप में नहीं रह गयी है, फिर भी उपलब्ध अनुवादों के आधापर इसकी रचना तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आस- पास निर्धारित की गई है। इस ग्रंथ के रचयिता पं॰ विष्णु शर्मा है। ...

                                               

प्रबन्ध (संस्कृत)

प्रबन्ध, मध्यकालीन संस्कृत साहित्य की एक विधा थी। इनमें प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन के अर्ध-ऐतिहासिक विवरण हैं। इनकी रचना १३ शताब्दी के बाद के काल में मुख्यतः गुजरात और मालवा के जैन विद्वानों ने किया। प्रबन्धों की भाषा बोलचाल की संस्कृत है जिसमें ...

                                               

बाणभट्ट

बाण भट्टराव सातवीं शताब्दी के संस्कृत गद्य लेखक और कवि थे। वह राजा हर्षवर्धन के आस्थान कवि थे। उनके दो प्रमुख ग्रंथ हैं: हर्षचरितम् तथा कादम्बरी। हर्षचरितम्, राजा हर्षवर्धन का जीवन-चरित्र था और कादंबरी दुनिया का पहला उपन्यास था। कादंबरी पूर्ण होन ...

                                               

बृहतत्रयी (संस्कृत महाकाव्य)

बृहत्त्रयी के अंतर्गत तीन महाकाव्य आते हैं - "किरातार्जुनीय" "शिशुपालवध" और "नैषधीयचरित"। भामह और दंडी द्वारा परिभाषित महाकाव्य लक्षण की रूढ़ियों के अनुरूप निर्मित होने वाले मध्ययुग के अलंकरण प्रधान संस्कृत महाकाव्यों में ये तीनों कृतियाँ अत्यंत ...

                                               

भामह

आचार्य भामह संस्कृत भाषा के सुप्रसिद्ध आचार्य थे। उन का काल निर्णय भी अन्य पूर्ववर्ती आचार्यों की तरह विवादपूर्ण है। परंतु अनेक प्रमाणो से यह सिद्ध होता है कि भामह ३०० ई० से ६०० ई० के मध्ये हुए। उन्होंने अपने काव्य अलंकार ग्रन्थ के अन्त में अपने ...

                                               

भास

भास संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध नाटककार थे जिनके जीवनकाल अधिक पता नहीं है। स्वप्नवासवदत्ता उनके द्वारा लिखित सबसे चर्चित नाटक है जिसमें एक राजा के अपने रानी के प्रति अविरहनीय प्रेम और पुनर्मिलन की कहानी है। कालिदास जो गुप्तकालीन समझे जाते हैं, ने ...

                                               

भोजप्रबन्ध

भोजप्रबंध संस्कृत लोकसाहित्य का एक अनुपम ग्रंथ है। यह बल्लाल की कृति है। इसकी रचना गद्यपद्यात्मक है। इसमें महाराज धारेश्वर भोज की राजसभा के कई सुंदर कथानक है। यद्यपि इन कथानकों की ऐतिहासिक प्रामाणिकता पूर्ण रूप से स्वीकृत नहीं की जा सकती, तथापि य ...

                                               

मयूर भट्ट

किंवदंती के अनुसार मयूर भट्ट महाकवि बाण के श्वसुर या साले कहे जाते हैं। कहते हैं- एक समय बाण की पत्नी ने मान किया और सारी रात मान किए रही। प्रभात होने को हुआ, चंद्रमा का तेज विशीर्ण होने लगा, दीप की लौ हिलने लगी, किंतु मान टूटा। अधीर हो बाण न एक ...

                                               

मालविकाग्निमित्रम्

मालविकाग्निमित्रम् कालिदास द्वारा रचित संस्कृत नाटक है। यह पाँच अंकों का नाटक है जिसमे मालवदेश की राजकुमारी मालविका तथा विदिशा के राजा अग्निमित्र का प्रेम और उनके विवाह का वर्णन है। वस्तुत: यह नाटक राजमहलों में चलने वाले प्रणय षड्यन्त्रों का उन्म ...

                                               

मेघदूतम्

मेघदूतम् महाकवि कालिदास द्वारा रचित विख्यात दूतकाव्य है। इसमें एक यक्ष की कथा है जिसे कुबेर अलकापुरी से निष्कासित कर देता है। निष्कासित यक्ष रामगिरि पर्वत पर निवास करता है। वर्षा ऋतु में उसे अपनी प्रेमिका की याद सताने लगती है। कामार्त यक्ष सोचता ...

                                               

रघुवंशम्

रघुवंश कालिदास रचित महाकाव्य है। इस महाकाव्य में उन्नीस सर्गों में रघु के कुल में उत्पन्न 29 राजाओं का इक्कीस प्रकार के छन्दों का प्रयोग करते हुए वर्णन किया गया है। इसमें दिलीप, रघु, दशरथ, राम, कुश और अतिथि का विशेष वर्णन किया गया है। वे सभी समाज ...

                                               

रसगंगाधर

रसगंगाधर संस्कृत साहित्यशास्त्पर प्रौढ़ एवं सर्वथा मौलिक कृति है। इसके निर्माता सर्वतंत्र स्वतंत्र पंडितराज जगन्नाथ हैं जो नवाव शाहाबुद्दीन के आश्रित तथा आसफ खाँ के द्वारा सम्मानित राजकवि थे। यह दाराशिकोह के समकालिक थे। पंडितराज न केवल मार्मिक, स ...

                                               

राजतरंगिणी

राजतरंगिणी, कल्हण द्वारा रचित एक संस्कृत ग्रन्थ है। राजतरंगिणी का शाब्दिक अर्थ है - राजाओं की नदी, जिसका भावार्थ है - राजाओं का इतिहास या समय-प्रवाह। यह कविता के रूप में है। इसमें कश्मीर का इतिहास वर्णित है जो महाभारत काल से आरम्भ होता है। इसका र ...

                                               

रुय्यक

कश्मीर के एक विद्वान्‌ परिवार में राजानक रुय्यक या रुचक का जन्म बारहवीं शताब्दी के प्रथम भाग में हुआ था। उद्भट के काव्यालंकार संग्रह के विवृतिकार राजानक तिलक इनके पिता थे, जो अलंकारशास्त्र के पंडित थे। श्रीकंठचरित्‌ में मंखक ने अध्यापक, विद्वान्‌ ...

                                               

वामनावतार

वामन विष्णु के पाँचवे तथा त्रेता युग के पहले अवतार थे। इसके साथ ही यह विष्णु के पहले ऐसे अवतार थे जो मानव रूप में प्रकट हुए - अलबत्ता बौने ब्राह्मण के रूप में। इनको दक्षिण भारत में उपेन्द्र के नाम से भी जाना जाता है।

                                               

विक्रमोर्वशीयम्

विक्रमोर्वशीयम् कालिदास का विख्यात नाटक। यह पांच अंकों का नाटक है। इसमें राजा पुरुरवा तथा उर्वशी का प्रेम और उनके विवाह की कथा है। एक बार देवलोक की परम सुंदरी अप्सरा उर्वशी अपनी सखियों के साथ कुबेर के भवन से लौट रही थी। मार्ग में केशी दैत्य ने उन ...

                                               

वैजयन्ती कोष

वैजयन्तीकोष, संस्कृत का एक कोशग्रन्थ है। यादव प्रकाश द्वारा 10वीं से 14वीं ई0 के मध्य रचित यह कोश अत्यंत प्रसिद्ध और प्रामाणिक कोश माना जाता है। इसमें आधुनिक कोशों के प्रमुख लक्षण, अर्थात् अकारादि-क्रम अथवा वर्णानुक्रम-योजना का बीज रूप मौजूद है। ...

                                               

वैदिक राष्ट्रगान

वैदिक राष्ट्रगान शुक्ल यजुर्वेद के २२वें अध्याय में मन्त्र संख्या २२ में वर्णित एक प्रार्थना है जिसे वैदिक कालीन राष्ट्रगान कहा जाता है। यह प्रार्थना यज्ञों में स्वस्ति मंगल के रूप में गाई जाती है। इसमें राष्ट्र के विभिन्न घटकों के सुख-समृद्धि की ...

                                               

वैराग्यशतकम्

वैराग्यशतकम् भर्तृहरि के तीन प्रसिद्ध शतकों में से एक है। इसमें वैराग्य सम्बन्धी सौ श्लोक हैं। शतकत्रय में अन्य दो हैं- शृंगारशतकम् व नीतिशतकम्।

                                               

व्यंजना

व्यंजना शब्द शक्ति – जब किसी शब्द के अभिप्रेत अर्थ का बोध न तो मुख्यार्थ से होता है और न ही लक्ष्यार्थ से, अपितु कथन के संदर्भ के अनुसार अलग – अलग अर्थ से या व्यंग्यार्थ से प्रकट होता हो वहाँ वह शब्द व्यंजक कहलाता है, उसके द्वारा प्रकट होने वाला ...

                                               

शिवानन्दलहरी

शिवानन्दलहरी आदि शंकराचार्य द्वारा विरचित शिव-स्तोत्र है। इसमें विभिन्न छन्दों के सौ श्लोक हैं। इसकी रचना आदि शंकर ने तब की थी जब वे श्रीशैलम में निवास कर रहे थे। यह मल्लिकार्जुन और भ्रमराम्बिका की स्तुति से आरम्भ होता है जो श्रीशैलम के अराध्य दे ...

                                               

शुकसप्तति

शुकसप्तति एक कथासंग्रह है जो मूलतः संस्कृत में रचा गया था। अपने गृहस्वामी के परदेश चले जाने पर कोई पालतू तोता अपनी स्वामिनी को हर रात एक कथा सुनाता है और इस प्रकार परपुरषों के आकर्षणजाल से अपनी स्वामिनी को बचाता है। इसकी विस्तृत वाचनिका के लेखक क ...

                                               

शृंगारशतकम्

इस रचना में कवि ने रमणियों के सौन्दर्य का तथा उनके पुरुषों को आकृष्ट करने वाले शृंगारमय हाव-भावों का चित्रण किया है। इस शतक में कवि ने स्त्रियों के हाव-भाव, प्रकार, उनका आकृषण व उनके शारीरिक सौष्ठव के बारे में विस्तार से चर्चा की है। कवि का कहना ...

                                               

श्लोक

संस्कृत की दो पंक्तियों की रचना, जिनके द्वारा किसी प्रकार का कथोकथन किया जाता है, श्लोक कहलाता है। श्लोक प्रायः छंद के रूप में होते हैं अर्थात् इनमें गति, यति और लय होती है। छंद के रूप में होने के कारण ये आसानी से याद हो जाते हैं। प्राचीनकाल में ...

                                               

संस्कृत काव्यशास्त्र का इतिहास

संस्कृत साहित्य में काव्यशास्त्र के लिए अलंकारशास्त्र, काव्यालंकार, साहित्यविद्या, क्रियाकल्प आदि शब्दों के प्रयोग मिलते हैं। इनमें अलंकारशास्त्र शब्द सर्वाधिक प्रचलित माना जाता है। भामह, वामन तथा उद्भट आदि प्राचीन आचार्यों ने काव्यविवेचन से सम्ब ...

                                               

समस्या-पूर्ति

समस्या-पूर्ति या समस्यापूरण भारतीय साहित्य में प्रचलित विशेष विधा है जिसमें किसी छन्द में कोई कविता का अंश दिया होता है और उस छन्द को पूरा करना होता है। यह कला प्राचीन काल से चली आ रही है। यह कला चौंसठ कलाओं के अन्तर्गत आती है। समस्यापूर्ति विशेष ...

                                               

साहित्य दर्पण

साहित्यदर्पण संस्कृत भाषा में लिखा गया साहित्य विषयक ग्रन्थ है जिसके रचयिता पण्डित विश्वनाथ हैं। विश्वनाथ का समय १४वीं शताब्दी ठहराया जाता है। मम्मट के काव्यप्रकाश के समान ही साहित्यदर्पण भी साहित्यालोचना का एक प्रमुख ग्रन्थ है। काव्य के श्रव्य ए ...

                                               

सिंह-सिद्धांत-सिन्धु

सिंह-सिद्धांत-सिन्धु तंत्र-मंत्र, साहित्य, काव्यशास्त्र, आयुर्वेद, सम्प्रदाय-ज्ञान, वेद-वेदांग, कर्मकांड, धर्मशास्त्र, खगोलशास्त्र-ज्योतिष, होरा शास्त्र, व्याकरण आदि अनेक विषयों के जाने-माने विद्वान शिवानन्द गोस्वामी | शिरोमणि भट्ट द्वारा वि॰सं॰ ...

                                               

अरविन्द त्रिपाठी

अरविन्द त्रिपाठी का जन्म उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के एक गाँव कोहड़ाभाँवर में 31 दिसंबर, 1959 ई० को हुआ। उनके पिता साहित्यिक संस्कार संपन्न व्यक्ति थे और स्वभावतः उन्हें आरंभिक शिक्षा और साहित्यिक संस्कार अपने पिता से विरासत में ही मिला। गोरखप ...

                                               

अरुण कमल

अरुण कमल आधुनिक हिन्दी साहित्य में समकालीन दौर के प्रगतिशील विचारधारा संपन्न, सहज शैली के प्रख्यात कवि हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त इस कवि ने कविता के अतिरिक्त आलोचना भी लिखी हैं, अनुवाद कार्य भी किये हैं तथा लंबे समय तक सुप्रसिद्ध साहित् ...

                                               

ओम थानवी

ओम थानवी हिंदी भाषा के लेखक, वरिष्ठ पत्रकार, संपादक तथा आलोचक हैं। थानवी वर्तमान में हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलपति हैं इससे पूर्व हिंदी के प्रमुख दैनिक अख़बार जनसत्ता के संपादक रह चुके हैं। इनकी चर्चित कृति संस ...

                                               

चो रामस्वामी

श्रीनिवास ऐयर रामस्वामी, जो चो रामस्वामी के नाम से प्रसिद्ध हैं, भारत के एक अभिनेता, हास्यकार, चरित्र अभिनेता, सम्पादक, राजनैतिक व्यंग्यकार, नाटककार, संवादलेखक, फिल्म निदेशक, तथा वकील थे।

                                               

नामवर सिंह

नामवर सिंह हिन्दी के शीर्षस्थ शोधकार-समालोचक, निबन्धकार तथा मूर्द्धन्य सांस्कृतिक-ऐतिहासिक उपन्यास लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रिय शिष्‍य रहे। अत्यधिक अध्ययनशील तथा विचारक प्रकृति के नामवर सिंह हिन्दी में अपभ्रंश साहित्य से आरम्भ कर निरन्तर स ...

                                               

परमानन्द श्रीवास्तव

परमानन्द श्रीवास्तव हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार थे। उनकी गणना हिन्दी के शीर्ष आलोचकों में होती है। गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्रेमचन्द पीठ की स्थापना में उनका विशेष योगदान रहा। कई पुस्तकों के लेखन के अतिरिक्त उन्होंने हिन्दी भाषा की साहित्यिक ...

                                               

महावीर प्रसाद द्विवेदी

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिन्दी के महान साहित्यकार, पत्रकार एवं युगप्रवर्तक थे। उन्होने हिंदी साहित्य की अविस्मरणीय सेवा की और अपने युग की साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना को दिशा और दृष्टि प्रदान की। उनके इस अतुलनीय योगदान के कारण आधुनिक हिंदी ...

                                               

रामानन्द चट्टोपाध्याय

रामानन्द चट्टोपाध्याय कोलकाता से प्रकाशित पत्रिका मॉडर्न रिव्यू के संस्थापक, संपादक एवं मालिक थे। उन्हें भारतीय पत्रकारिता का जनक माना जाता है।

                                               

विभूति नारायण राय

विभूति नारायण राय १९७५ बैच के यू॰पी॰ कैडर के एक संवेदनशील आई॰पी॰एस॰ अधिकारी होने के साथ-साथ हिन्दी कथाकार के रूप में भी प्रसिद्ध रहे हैं। प्रशासनिक क्षेत्र में जहाँ उन्हें विशिष्ट सेवा के लिये राष्ट्रपति पुरस्कार तथा पुलिस मेडल से सम्मानित किया ज ...

                                               

शिवदान सिंह चौहान

शिवदान सिंह चौहान हिन्दी साहित्य के प्रथम मार्क्सवादी आलोचक के रूप में ख्यात हैं। लेखक होने के साथ-साथ वे सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे।

                                               

शिवपूजन सहाय

शिवपूजन सहाय | प्रारम्भिक शिक्षा आरा में | फिर १९२१ से कलकत्ता में पत्रकारिता |1924 में लखनऊ में प्रेमचंद के साथ माधुरी का सम्पादन| 1926 से 1933 तक काशी में प्रवास और पत्रकारिता तथा लेखन | 1934 से 1939 तक पुस्तक भंडार, लहेरिया सराय में सम्पादन-का ...

                                               

रसमीमांसा

रसमीमांसा की प्रस्तावना में ओमप्रकाश सिंह लिखते हैं कि-"आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक रसमीमांसा हिन्दी साहित्य की सैद्धान्तिक समीक्षा की अकेली पुस्तक है। शुक्ल जी से पहले हिन्दी साहित्य के किसी समीक्षक ने सैद्धान्तिक समीक्षा पर न तो किसी ग्रन्थ ...

                                               

तमिल साहित्य

इसी शीर्षक के पुस्तक के लिए देखें तमिल साहित्य का इतिहास तमिल भाषा का साहित्य अत्यन्त पुराना है। भारत में संस्कृत के अलावा तमिल का साहित्य ही सबसे प्राचीन साहित्य है। अन्य भाषाओं की तरह इसे भी सामाजिक आवश्यकताओं ने जन्म दिया है।