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दिगम्बर साधु

दिगम्बर साधु जिन्हें मुनि भी कहा जाता है सभी परिग्रहों का त्याग कर कठिन साधना करते है। दिगम्बर मुनि अगर विधि मिले तो दिन में एक बार भोजन और तरल पदार्थ ग्रहण करते है। वह केवल पिच्छि, कमण्डल और शास्त्र रखते है। इन्हें निर्ग्रंथ भी कहा जाता है जिसका ...

                                               

द्रव्यसंग्रह

द्रव्यसङ्ग्रह ९-१० वीं सदी में लिखा गया एक जैन ग्रन्थ है। यह सौरसेणी प्राकृत में आचार्य नेमिचंद्र द्वारा लिखा गया था। द्रव्यसंग्रह में कुल ५८ गाथाएँ है। इनमें छः द्रव्यों का वर्णन है: जीव, पुद्गल, धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, आकाश और काल द्रव्य। यह ...

                                               

धवला टीका

धवला टीका, दिगम्बर जैन परम्परा के प्रमुख ग्रंथ षट्खण्डागम का टीकाग्रंथ है। इसके रचयता, आचार्य जिनसेन है। यह संस्कृत मिश्रित शौरसेनी प्राकृत भाषाबद्ध है। इसमें प्राचीन भारतीय गणित के दर्शन होते हैं।

                                               

नमिनाथ

नमिनाथ जी जैन धर्म के इक्कीसवें तीर्थंकर हैं। उनका जन्म मिथिला के इक्ष्वाकु वंश में श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अश्विनी नक्षत्र में हुआ था। इनकी माता का नाम विप्रा रानी देवी और पिता का राजा विजय था।

                                               

नाभिराज

जैन आगम के अनुसार, समय के चक्र के दो भाग होते है: अवसर्पणी और उत्सर्पणी। अवसर्पणी में जब भोगभूमि का अंत होने लगता है, तब कल्पवृक्ष ख़त्म होने लगते है। तब १४ कुलकर जन्म लेते है। कुलकर अपने समय के सबसे बुद्धिमान व्यक्ति होते है। वह लोगों को संसरी क ...

                                               

पंच परमेष्ठी

पंच परमेष्ठी जैन धर्म के अनुसार सर्व पूजिए हैं। परमेष्ठी उन्हें कहते है हैं जो परम पद स्थित हों। यह पंच परमेष्ठी हैं- मुनि उपाध्याय परमेष्ठी- जो नए मुनियों को ज्ञान उपार्जन में सहयोग करते हैं। आचार्य परमेष्ठी- मुनि संघ के नेता। इनके छत्तीस मूल गु ...

                                               

परस्परोपग्रहो जीवानाम्

परस्परोपग्रहो जीवानाम् संस्कृत भाषा में लिखे गए प्रथम जैन ग्रंथ, तत्त्वार्थ सूत्र का एक श्लोक है । इसका अर्थ होता है: "जीवों के परस्पर में उपकार हैं।" सभी जीव एक दूसरे पर आश्रित है।

                                               

पार्श्वनाथ

नोट:- भगवान पार्श्वनाथ जैन धर्म के तेइसवें 23वें तीर्थंकर हैं। जैन ग्रंथों के अनुसार वर्तमान में काल चक्र का अवरोही भाग, अवसर्पिणी गतिशील है और इसके चौथे युग में २४ तीर्थंकरों का जन्म हुआ था।

                                               

प्रभासस्वामी

प्रभासस्वामी भगवान महावीर के अन्तिम तथा ११ वें गणधर थे। ये राजगृह के कौंडिन्य ब्राह्मण थे, ये आयु में सबसे छोटे थे । इन्होने ४० वर्ष कि आयु में निर्वाण प्राप्त किया।

                                               

प्रमुख जैन तीर्थ

भारत पर्यंत जैन धर्म के अनेकों तीर्थ क्षेत्र हैं। यहाँ प्रमुख तीर्थ क्षेत्रों की जानकारी दी गयी है। यह जानकारी प्रमुख तीर्थ क्षेत्रों वाले राज्यों के अनुसार दी गई है। भारत के प्रमुख जैन तीर्थ क्षेत्र इस प्रकार हैं - श्री सियावास तीर्थ क्षेत्र बेग ...

                                               

प्रवचनसार

प्रवचनसार आचार्य कुन्दकुन्द की एक महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है यह समयसार के बाद की रचना है तथा सीमंधर स्वामी के समवसरण से लौटने के पश्चात उनके प्रवचनों का सार के रूप में लिखी गई कृति है इसलिए इसका नाम भी प्रवचनसार रखा गया है यह तीन भागों में विभक ...

                                               

बलत्कर गण

Balatkara गण एक प्राचीन जैन मठवासी आदेश. यह है एक खंड के Mula संघ. यह अक्सर कहा जाता है Balatkara गण सरस्वती Gachchha. जब तक 20 वीं सदी की शुरुआत में यह किया गया था, वर्तमान में स्थानों की एक संख्या में भारतहै। हालांकि, सभी अपनी सीटों में उत्तर भ ...

                                               

बलभद्र

जैन धर्म, में बलभद्र उन तिरसठ शलाकापुरुष में से होते है जो हर कर्म भूमि के दुषमा-सुषमा काल में जन्म लेते हैं। इन तिरसठ शलाकापुरुषों में से चौबीस तीर्थंकर, बारह चक्रवर्ती, नौ बलभद्र, नौ नारायण, और नौ प्रतिनारायण उनके जीवन की कहानियाँ सबसे प्रेरणाद ...

                                               

बाहुबली

बाहुबली प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र थे। अपने बड़े भाई भरत चक्रवर्ती से युद्ध के बाद वह मुनि बन गए। उन्होंने एक वर्ष तक कायोत्सर्ग मुद्रा में ध्यान किया जिससे उनके शरीपर बेले चढ़ गई। एक वर्ष के कठोर तप के पश्चात् उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति ह ...

                                               

ब्रह्मचर्य

ब्रह्मचर्य योग के आधारभूत स्तंभों में से एक है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है सात्विक जीवन बिताना, शुभ विचारों से अपने वीर्य का रक्षण करना, भगवान का ध्यान करना और विद्या ग्रहण करना। यह वैदिक धर्म वर्णाश्रम का पहला आश्रम भी है, जिसके अनुसार यह ०-२५ वर्ष त ...

                                               

भगवान महावीर का साधना काल

भगवान महावीर द्वारा गृह त्याग कर मुनि दीक्षा लेने से लेकर भगवान महावीर के कैवल्य ज्ञान तक की अवधि के बीच का समय साधना काल के नाम से जाना जाता है । यह काल 12 वर्ष का था, इस काल के दौरान प्रभु महावीर ने अनेक कष्टों को सहन किया, अनेकों परीषहो को सहन ...

                                               

भट्टारक

जैन धर्म में मठों के स्वामी भट्टारक कहलाते हैं। अधिकांश भट्टारक दिगम्बर होते हैं। प्राचीन काल में बौद्धों और सनातनी हिन्दुओं में भी भट्टारक होने के प्रमाण हैं किन्तु आजकल केवल जैन धर्म में ही भट्टारक मिलते हैं, पूर्व समय में संपूर्ण भारत में ही भ ...

                                               

भरत चक्रवर्ती

भरत चक्रवर्ती, प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र थे। जैन और हिन्दू पुराणों के अनुसार वह चक्रवर्ती सम्राट थे और उन्ही के नाम पर भारत का नाम "भारतवर्ष" पड़ा। जैन ग्रंथ "आदिपुराण" जिसके रचयिता आचार्य श्री जिनसेन स्वामी है ने सातवीं शताब्दी में ...

                                               

भिक्षु (जैन धर्म)

आचार्य भिक्षु जैन धर्म के तेरापंथ संप्रदाय के संस्थापक एवं प्रथम आचार्य थे। उन्होंने आध्यात्मिक क्रांति के प्रारंभिक चरण में, वह स्थानकवासी सम्प्रदाय के आचार्य रघुनाथजी के समूह से बाहर चले गए। उस समय वह 13 संतों, 13 अनुयायियों और 13 बुनियादी नियम ...

                                               

मंडितपुत्र

प्रत्येक गणधर को अपने ज्ञान में कोई ना कोई शंका थी, जिसका समाधान भगवान महावीर ने किया था, मंडितपुत्र के मन में शंका थी कि, आत्मा का बंधन और मोक्ष होता है या नहीं?

                                               

मल्लिनाथ

मल्लिनाथ जी उन्नीसवें तीर्थंकर है। जिन धर्म भारत का प्राचीन सम्प्रदाय हैं जैन धर्म के उन्नीसवें तीर्थंकर भगवान श्री मल्लिनाथ जी का जन्म मिथिलापुरी के इक्ष्वाकुवंश में मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष एकादशी को अश्विन नक्षत्र में हुआ था। इनके माता का नाम मात ...

                                               

महाव्रत

जैन धर्म में निम्नलिखित पाँच व्रतों को महाव्रत कहा जाता है- ब्रह्मचर्य अस्तेय चोरी न करना अपरिग्रह धन का संग्रह न करना अहिंसा हिंसा न करना सत्यझुठ न बोलना यानि कि सदैव सत्य बोलना

                                               

मुनि

राग-द्वेष-रहित संतों, साधुओं और ऋषियों को मुनि कहा गया है। मुनियों को यति, तपस्वी, भिक्षु और श्रमण भी कहा जाता है। भगवद्गीता में कहा है कि जिनका चित्त दु:ख से उद्विग्न नहीं होता, जो सुख की इच्छा नहीं करते और जो राग, भय और क्रोध से रहित हैं, ऐसे न ...

                                               

मूल संघ

Mula संघ एक प्राचीन जैन मठवासी आदेश. Mula का शाब्दिक अर्थ है "रूट" या मूल आदेश. Mula-संघा किया गया है मुख्य दिगम्बर जैन के आदेश. आज दिगंबर जैन परंपरा का पर्याय बन गया है Mula संघा. महान आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी के साथ जुड़ा हुआ है Mula संघा. सबसे ...

                                               

मेतार्यस्वामी

मेतार्यस्वामी भगवान महावीर के १० वें गणधर थे। जो कि कौंडिन्य ब्राह्मण थे, इन्होने भी अपने ३०० शिष्यों के साथ भगवान महावीर से मुनि दीक्षा ग्रहण की थी । इन्होने ६२ वर्ष कि उम्र में मोक्ष प्राप्त किया।

                                               

मोक्ष (जैन धर्म)

जैन धर्म में मोक्ष का अर्थ है पुद्ग़ल कर्मों से मुक्ति। जैन दर्शन के अनुसार मोक्ष प्राप्त करने के बाद जीव जन्म मरण के चक्र से निकल जाता है और लोक के अग्रभाग सिद्धशिला में विराजमान हो जाती है। सभी कर्मों का नाश करने के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती ह ...

                                               

मौर्यपुत्र

प्रत्येक गणधर को अपने ज्ञान में कोई ना कोई शंका थी, जिसका समाधान भगवान महावीर ने किया था, मौर्यपुत्र के मन में शंका थी कि, क्या देवता होते हैं या नहीं?

                                               

यूरोप में जैन धर्म

जैन धर्म को पश्चिम में लाने का श्रेय एक जर्मन विद्वान हरमन जैकोबी को जाता है, जिन्होंने कुछ जैन साहित्य का अनुवाद किया और इसे 1884 में पूर्व की पवित्र पुस्तकें श्रृंखला में प्रकाशित किया। यूरोप में, सबसे बड़ी जैन आबादी ब्रिटेन में है । भारत से बा ...

                                               

रत्नत्रय

रत्नत्रय का प्रयोग जैन ग्रन्थों में सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र को एक साथ कहने के लिए किया गया है। सत्‌, सम्यक्‌, समीचीन, बीतकलक, निर्दोष आदि शब्द प्राय: एक से अर्थ या भाव रखते हैं। दर्शन या दृष्टि का संबंध होता है श्रद्धा से; ज्ञ ...

                                               

राजा सिद्धार्थ

जैन ग्रन्थ उत्तरपुराण के अनुसार वैशाली के राजा चेटक के 10 पुत्और सात पुत्रियाँ थी। उनकी ज्येषठ पुत्री पिर्यकारिणी अर्थात त्रिशला का विवाह राजा सिद्धार्थ से हुआ था। माता त्रिशला द्वारा देखें गए १६ शुभ स्वपनों का अर्थ राजा सिद्धार्थ ने बताया था।

                                               

राजा हरसुख राय

राजा हरसुख राय सन 1858 ज्येष्ठ वादी 13 के मेले में मुग़ल बादशाह शाह आलम के खजांची थे। वे दिल्ली में कई जैन मंदिरों के निर्माण के लिए जाने जाते हैं।

                                               

व्यक्तस्वामी

प्रत्येक गणधर को अपने ज्ञान में कोई ना कोई शंका थी, जिसका समाधान भगवान महावीर ने किया था, व्यक्तस्वामी के मन में शंका थी कि, पंचभूत आदि तत्व होते हैं या नहीं?

                                               

व्रत (जैन)

सत्प्रवृत्ति और दोषनिवृत्ति को ही जैनधर्म में व्रत कहा जाता है। सत्कार्य में प्रवृत्त होने के व्रत का अर्थ है उसके विरोधी असत्कार्यों से पहले निवृत्त हो जाना। फिर असत्कार्यों से निवृत्त होने के व्रत का मतलब है, उसके विरोधी सत्कार्यों में मन, वचन ...

                                               

शलाकापुरुष

जैन धर्म में ६३ शलाकापुरुष हुए है। यह है – चौबीस तीर्थंकर, बारह चक्रवर्ती, नौ बलभद्र, नौ वासुदेव और नौ प्रति वासुदेव। इन ६३ महापुरुष जिन्हें त्रिषष्टिशलाकापुरुष भी कहते हैं के जीवन चरित्र दूसरों के लिए प्रेरणादायी होते है।

                                               

शिव मुनि (जैन आचार्य)

डॉ.शिव मुनि जी जैन श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य है। शिवमुनि ने भारतीय धर्मों में विषय पर पाँच वर्षों तक शोध किया। उन्हें पीचडी की उपाधि मिल गई। शिव मुनि जी महाराज ध्यानयोगी हैैं। उनके अध्यात्म का मुख्य विषय ध्यान है।

                                               

श्रमण परम्परा

श्रमण परम्परा भारत में प्राचीन काल से जैन, आजीविक, चार्वाक, तथा बौद्ध दर्शनों में पायी जाती है। ये वैदिक धारा से बाहर मानी जाती है एवं इसे प्रायः नास्तिक दर्शन भी कहते हैं। भिक्षु या साधु को श्रमण कहते हैं, जो सर्वविरत कहलाता है। श्रमण को पाँच मह ...

                                               

श्रावक

जैन धर्म में श्रावक शब्द का प्रयोग गृहस्थ के लिए किया गया हैं। श्रावक अहिंसा आदि व्रतों को संपूर्ण रूप से स्वीकार करने में असमर्थ होता हैं किंतु त्यागवृत्तियुक्त, गृहस्थ मर्यादा में ही रहकर अपनी त्यागवृत्ति के अनुसार इन व्रतों को अल्पांश में स्वी ...

                                               

श्रेयांसनाथ

श्रेयांसनाथ, जैन धर्म में वर्तमान अवसर्पिणी काल के ११वें तीर्थंकर थे। श्रेयांसनाथ जी के पिता का नाम विष्णु और माता का वेणुदेवी था। उनका जन्मस्थान सिंहपुऔर निर्वाणस्थान संमेदशिखर माना जाता है। इनका चिन्ह गैंडा है। श्रेयांसनाथ के काल में जैन धर्म क ...

                                               

श्वेताम्बर

जैन दर्शन शाश्वत सत्य पर आधारित है। समय के साथ ये सत्य अदृश्य हो जाते है और फिर सर्वग्य या केवलग्यानी द्वारा प्रकट होते है। परम्परा से इस अवसर्पिणी काल मे भगवान ऋषभदेव प्रथम तीर्थन्कर हुए, उनके बाद भगवान पार्श्वनाथ तथा महावीर या हुए। जैन धर्म सिख ...

                                               

श्वेताम्बर तेरापन्थ

श्वेताम्बर तेरापन्थ, जैन धर्म में श्वेताम्बर संघ की एक शाखा का नाम है। इसका उद्भव विक्रम संवत् 1817 में हुआ। इसका प्रवर्तन मुनि भीखण ने किया था जो कालान्तर में आचार्य भिक्षु कहलाये। वे मूलतः स्थानकवासी संघ के सदस्य और आचार्य रघुनाथ जी के शिष्य थे ...

                                               

समवशरण

जैन धर्म में समवशरण "सबको शरण", तीर्थंकर के दिव्य उपदेश भवन के लिए प्रयोग किया जाता है| समवशरण दो शब्दों के मेल से बना है, "सम" और "अवसर"। जहाँ सबको ज्ञान पाने का समान अवसर मिले, वह है समवशरण। यह तीर्थंकर के केवल ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् देव ...

                                               

सराक

समाज एक जैनधर्मावलंवी समुदाय है। इस समुदाय के लोग बिहार, झारखण्ड, बंगाल एवं उड़ीसा के लगभग १५ जिलों में निवास करते हैं। इनकी संख्या लगभग १५ लाख है। सराक संस्कृत के शब्द श्रावक का अपभ्रंश रूप है। जैनधर्म में आस्था रखने वाले श्रद्धालु को श्रावक कहत ...

                                               

सल्लेखना

सल्लेखना मृत्यु को निकट जानकर अपनाये जाने वाली एक जैन प्रथा है। इसमें जब व्यक्ति को लगता है कि वह मौत के करीब है तो वह खुद खाना-पीना त्याग देता है। दिगम्बर जैन शास्त्र अनुसार समाधि या सल्लेखना कहा जाता है, इसे ही श्वेतांबर साधना पध्दती में संथारा ...

                                               

सामायिक

सामायिक जैन धर्म में उपासना का एक तरीका है । दो घड़ी अर्थात 48 मिनट तक समतापूर्वक शांत होकर किया जाने वाला धर्म-ध्यान ही सामायिक है।जैन आगमो में ऐसा वर्णन है कि चाहे गृहस्थ हो या साधु सामायिक सभी के लिए अनिवार्य है। अपने जीवनकाल में से प्रत्येक द ...

                                               

सिमंधर स्वामी

तीर्थंकर सीमंधर स्वामी महाविदेह क्षेत्र में रहते हैं जो एक अलग जैन पौराणिक लोक है।देखें जैन ब्रह्माण्ड विज्ञान पांच ग्रहों के भरत क्षेत्र में वर्तमान में 5 वीं Ara एक अपमानित समय-चक्र में जो तीर्थंकरों नहीं अवतार. सबसे हाल ही में तीर्थंकर पर मौजू ...

                                               

सुमतिनाथ

सुमतिनाथ जी वर्तमान अवसर्पिणी काल के पांचवें तीर्थंकर थे। तीर्थंकर का अर्थ होता है जो तीर्थ की रचना करें। जो संसार सागर से मोक्ष तक के तीर्थ की रचना करें, वह तीर्थंकर कहलाते हैं।

                                               

स्थानकवासी

स्थानकवासी, श्वेताम्बर जैन सम्प्रदाय का एक उपसम्प्रदाय है। इसकी स्थापना १६५३ के आसपास लवजी नामक एक व्यापारी ने की थी। इस सम्प्रदाय की मान्यता है कि भगवान निराकार है, अतः ये किसी मूर्ति की पूजा नहीं करते। 5 क्रियोद्धारकों की शिष्य परम्परा स्थानकवा ...

                                               

स्वामी गुणभद्र आचार्य

स्वामी गुणभद्र आचार्य, दिगंबर जैन संप्रदाय के सेनसंघ में अवतीर्ण जिनसेन आचार्य के प्रधान शिष्य और उत्तरपुराण, आत्मानुशासन, भावसंग्रह, जिनदत्त काव्य आदि के रचयिता। इस नाम के कई जैन ग्रंथकार तथा आचार्य हो गए हैं।

                                               

२४ तीर्थंकर

२४ तीर्थंकरों का वर्णन आइटम विवरण: यह लगभग 9 फीट या 3 मीटर है 1 धनुष 1 लाख 100000 एक लाख 1 पूर्वा एक्स 84 लाख 84 लाख वर्ष = 70560000000000 वर्ष = 70560 अरब वर्ष

                                               

तत्त्वार्थ सूत्र

तत्त्वार्थसूत्र, जैन आचार्य उमास्वामी द्वारा रचित एक जैन ग्रन्थ है। इसे तत्त्वार्थ-अधिगम-सूत्र तथा मोक्ष-शास्त्र भी कहते हैं। संस्कृत भाषा में लिखा गया यह प्रथम जैन ग्रंथ माना जाता है। इसमें दस अध्याय तथा ३५० सूत्र हैं। उमास्वामी सभी जैन मतावलम्ब ...