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सूचना युग

सूचना युग, जो क्म्प्यूटर युग और डीजिटल युग भी कहलाता है, मानव इतिहास का एक काल है जिसमें औद्योगिक क्रांति के बाद हुए औद्योगीकरण द्वारा स्थापित आर्थिक व्यवस्था धीरे-धीरे सूचना क्रांति द्वारा स्थापित कम्प्यूटर-आधारित अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हो र ...

                                               

अखिल विश्व गायत्री परिवार

वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा स्थापित युग सुधार आंदोलन है। जैसा कि इसका ध्येय वाक्य है:- हम सुधरेंगे, युग सुधरेगा, हम बदलेंगे, युग बदलेगा। इस विश्वास के आधापर आचार्य श्रीराम शर्मा जी की मान्यता थी कि व्यक्ति के आत्म सुधार स ...

                                               

ऑल योर बेस आर बिलॉन्ग टू अस

ऑल योर बेस आर बिलॉन्ग टू अस एक टूटी-फूटी अंग्रेज़ी का सूत्रवाक्य है जो सन् 2000-2002 के समय में तेज़ी से इन्टरनेट पर फैल गया। यह एक "ज़ीरो विंग" नाम के जापानी विडीयो खेल में जापानी से अंग्रेज़ी अनुवाद में ग़लतियों की वजह से बन गया था। इसका सही अन ...

                                               

गोल्डीलॉक्स

गोल्डीलॉक्स और तीन भालू एक प्रसिद्ध अंग्रेज़ी परी कथा है। कथन के रूप में यह कहानी लम्बे अरसे से ब्रिटेन में चली आ रही थी, लेकिन लिखित रूप में इसे सबसे पहले ब्रिटिश लेखक रॉबर्ट साउदी ने गुमनाम रूप से सन् 1837 में अपने एक लेख-संग्रह में छपवाया। अंग ...

                                               

जय श्री राम

जय श्री राम का अर्थ है "भगवान राम की जय हो" या "भगवान राम की विजय", राम हिंदू देवता और भगवान विष्णु के सातवें अवतार हैं। धार्मिक हिंदू जय श्री राम का जाप करते हैं, यह डर, दुःख, तनाव, चिंताओं से छुटकारा पाने का एक तरीका है और साथ ही जप करने से जन् ...

                                               

दिल-ए-नादाँ

दिल-ए-नादाँ या दिल-ए-नादान उर्दू-हिंदी का एक वाक्यांश है जो उत्तर भारत और पाकिस्तान की संस्कृति में बहुत सन्दर्भों में प्रयोग होता है। यह मूल रूप में फ़ारसी का वाक्यांश है और उसमें इस دلِ ناداں ‎ लिखा जाता है। इसका प्रयोग अक्सर उन स्थितियों में ह ...

                                               

देखो सो पाओ

देखो सो पाओ या विज़ीविग अभिकलन में किसी भी ऐसी प्रणाली को कहा जाता है जिसमें जो संपादकों और निर्माताओं को निर्माण करते समय स्क्रीन पर दिखता है ठीक वैसा ही पढ़ने या देखने वालों को स्क्रीन पर या छपने पर बाद में दिखता है। "देखो सो पाओ" सॉफ़्टवेयर बन ...

                                               

पिरिक जीत

किसी मुक़ाबले में पिरिक जीत ऐसी जीत को कहा जाता है जिसको पाने के लिए विजेता को इतनी भारी हानि उठानी पड़े कि वास्तव में यह असली जीत ही न हो। यह आधुनिक भाषा में एक सूत्रवाक्य बन चुका है जिसका अर्थ है "ऐसी जीत जो ली तो जा सकती है, लेकिन अपने ही भले ...

                                               

प्रत्यास्थता मापांक

यंग मापांक या प्रत्यास्थता मापांएक संख्या है जो बताती है कि किसी वस्तु या पदार्थ पर बल लगाकर उसका आकार बदलना कितना कठि16न है। इसका मान वस्तु के प्रतिबल-विकृति वक्र के प्रवणता के बराबर होता है। परिभाषा के रूप में, λ = def stress strain {\displayst ...

                                               

प्राइमस इंटर पारेस

प्राइमस इंटर पारेस लातिनी भाषा का एक सूत्रवाक्य है, जिसका अर्थ है "बराबरों में प्रथम"। इसका प्रयोग ऐसी स्थिति के लिए किया जाता है जिसमें किसी समूह में सभी सदस्यों का औपचारिक दर्जा बारबार का होता है लेकिन उनमें से एक व्यक्ति वास्तव में उस समूह का ...

                                               

बंजारानामा

बंजारानामा, अठारहवीं शताब्दी के भारतीय शायर नज़ीर अकबराबादी द्वारा लिखी गयी एक प्रसिद्ध कविता है। इस रचना का मुख्य सन्देश है के सांसारिक सफलताओं पर अभिमान करना मूर्खता है क्योंकि मनुष्य की परिस्थितियाँ पलक झपकते बदल सकतीं हैं। धन-सम्पति तो आनी-जा ...

                                               

ब्लड, टॉय्ल, टीयर्ज़ ऐण्ड स्वॅट

ब्लड, टॉय्ल, टीयर्ज़ ऐण्ड स्वॅट एक सूत्रवाक्य है और ब्रिटेन के भूतपूर्व प्रधानमन्त्री विन्सटन चर्चिल द्वारा 13 मई 1940 को द्वितीय महायुद्ध के दौरान दिगए एक प्रेरणाजनक भाषण का अनौपचारिक शीर्षक है।

                                               

सूत्रवाक्य

सूत्रवाक्य या तकिया कलाम एक ऐसे वाक्य या वाक्यांश को बोलते हैं जो बार-बार किसी व्यक्ति या चीज़ के सन्दर्भ में सुने जाने से लोक संस्कृति में पहचाना जाने लगता है। दूसरे शब्दों में यह केवल एक वाक्य न रह के एक सूत्र बन गया हो। मसलन, "कुत्ते-कमीने, मै ...

                                               

कपूर परिवार

कपूर परिवार एक प्रसिद्ध भारतीय परिवार है, इस परिवार के लोग ज्यादातर सिनेमा,अभिनेता,फ़िल्म निर्देशक और फ़िल्म निर्माता है। इस परिवार की कई पीढियों ने हिन्दी फ़िल्मों के विकास में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस परिवार ने हिन्दी सिनेमा और बॉलीवु ...

                                               

दस सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ चलचित्र

दस सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ हिंदी चलचित्र कुछ लोग इन्हें मानते हैं: जागते रहो मदर इन्डिया बन्दिनी जाने भी दो यारों प्यासा शोले गाइड दो बीघा ज़मीन मुगल-ए-आज़म आवारा

                                               

धूप छाँव (1935 फ़िल्म)

धूप छाँव सन् 1935 की नितिन बोस द्वारा निर्देशित हिन्दी फ़िल्म है। यह बंगाली फिल्म भाग्य चक्र की रीमेक थी। धूप छाँव पार्श्व गायन का उपयोग करने वाली पहली हिन्दी फ़िल्म थी। वस्तुतः इसके निर्देशक नितिन बोस ने ही पार्श्व गायन की परंपरा आरंभ की थी। सबस ...

                                               

भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष

3 मई 2013 को भारतीय सिनेमा पूरे सौ साल का हो गया। किसी भी देश में बनने वाली फिल्में वहां के सामाजिक जीवन और रीति-रिवाज का दर्पण होती हैं। भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों के इतिहास में हम भारतीय समाज के विभिन्न चरणों का अक्स देख सकते हैं।उल्लेखनीय है क ...

                                               

रंगरेज़ (२०१३ हिन्दी फ़िल्म)

रंगरेज़ प्रियदर्शन द्वारा निर्देशित एक हिन्दी फ़िल्म है। इसमें जैकी भगनानी, प्रिया आनंद प्रमुख भूनिका में तथा सहायक भूमिका में राजपाल यादव एवं अमितोष नागपाल हैं। रंगरेज़ तमिल सिनेमा की नाडोडियाल नामक फ़िल्म का रीमेक है, पहले ही तेलुगु, मलयालम एवं ...

                                               

अमूर्त और ठोस

अमूर्त और ठोस वर्गीकरण है जो यह दर्शाते हैं कि क्या कोई शब्द बिना किसी भौतिक संदर्भक वाले वस्तु को वर्णित करता है या भौतिक संदर्भक वाले वस्तु को। आम तौपर ये दर्शन और अर्थविज्ञान में प्रयुक्त होते हैं।

                                               

अमूर्तन

अमूर्तन अवधारणाओं की वह प्रक्रिया होती है इसमें कुछ उदाहरणों के प्रयोग और श्रेणीकरण, प्राथमिक ज्ञान के व्याख्यान और अन्य प्रणालियों से कोई सामान्य नियम या अवधारणा की परिभाषा हो। अमूर्तन के बाद, सभी उदाहरण उस अमूर्त नियम या अवधारणा द्वारा स्थापित ...

                                               

चिन्ह (औपचारिक)

तार्किक चिन्ह तर्कशास्त्र की एक बुनियादी अवधारणा है। यह वे टोकन होते हैं जिनके द्वारा किसी औपचारिक भाषा में अवधारणाओं को अभिव्यक्त करा जाता है।

                                               

प्रकार-टोकन अंतर

प्रकार-टोकन अंतर तर्कशास्त्र, भाषाविज्ञान, अधितर्कशास्त्र, अक्षरकला और कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग में शब्दों के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए प्रयोग होता है। मसलन अगर "हम दोनों एक ही गाड़ी चलाते हैं" कहा जाए, तो यह स्पष्ट नहीं है कि "हम दोनों एक ही प्रक ...

                                               

प्रथम आदितत्व

प्रथम आदितत्व किसी ऐसे आधारभूत कथन, नियम या सिद्धान्त को कहते हैं जो किसी अन्य नियम या सिद्धांत द्वारा निष्कर्षित न किया जा सके। गणित में प्राथमिक ज्ञान को अभिगृहीत कहा जाता है।

                                               

सादगी

सादगी सरल होने की अवस्था या गुणवत्ता हैं। यदि कुछ समझने या समझाने में आसान होता हैं, वह सरल लगता हैं; इसके विपरीत कुछ जटिल हो तो सादगी भरा नहीं रहता। विकल्पतः, जैसा हर्बर्ट अ० साइमन सुझाते हैं, कुछ आसान या जटिल होना इस पर निर्भर करता हैं कि हम उस ...

                                               

अक्षमालिकोपनिषद

अक्षमालिका उपनिषद ॠग्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। इसमें प्रजापति ब्रह्मा और कुमार कार्तिकेय के प्रश्नोत्तर को गूंथा गया है। इसमें सर्वप्रथम अक्षमाला के विषय में जिज्ञासा की गयी है कि यह क्या है, इसके कितने लक्षण हैं, कितने भेद है, कितने स ...

                                               

अयम् आत्मा ब्रह्म

अयम् आत्मा ब्रह्म उपनिषद् के इस महावाक्य के अनुसार आत्मा और परब्रह्म का समीकरण है। अर्थात व्यक्ति विश्व का रहस्य, जो परब्रह्म को विदित है, जान सकता है। अयमात्मा ब्रह्म भारत के पुरातन हिंदू शास्त्रों व उपनिषदों में वर्णित महावाक्य है, जिसका शाब्दि ...

                                               

उपनिषद् सिद्धान्त

मुख्य उपनिषदों में संसार के साथ समस्त जीवों की भिन्नता को दर्शाया गया है। उपनिषदिक सिद्धान्त के अनुसार केवल एक ब्रह्म ही है। उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं जैसा कि "एकवाद्वितीयम् ब्रह्म" से दर्शित होता है। इस ब्रह्म में ही विक्षेप के कारण भ्रम रुपी मा ...

                                               

उपनिषद् सूची

वेद शब्द का अर्थ ज्ञान है। वेद-पुरुष के शिरोभाग को उपनिषद् कहते हैं। उप नि षद् । किसी विषय के होने न होने का निर्णय ज्ञान से ही होता है। अज्ञान का अनुभव भी ज्ञान ही कराता है। अतः ज्ञान को प्रमाणित करने के लिए ज्ञान से भिन्न किसी वस्तु की आवश्यकता ...

                                               

ऐतरेय उपनिषद

ऐतरेय उपनिषद एक शुक्ल ऋग्वेदीय उपनिषद है। ऋग्वेदीय ऐतरेय आरण्यक के अन्तर्गत द्वितीय आरण्यक के अध्याय 4, 5 और 6. का नाम ऐतरेयोपनिषद् है। यह उपनिषद् ब्रह्मविद्याप्रधान है।

                                               

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद कौषीतकि उपनिषद का पूरा नाम है। यह एक ऋग्वेदीय उपनिषद है। कौषीतकि उपनिषद ॠग्वेद के कौषीतकि ब्राह्मण का अंश है। इसमें कुल चार अध्याय हैं। इस उपनिषद में जीवात्मा और ब्रह्मलोक, प्राणोपासना, अग्निहोत्र, विविध उपासनाएं, प्राणतत्व ...

                                               

तुरीय

तुरीय अनुभव की एक अवस्था है, जिसमें मन और मस्तिष्क में कुछ भी नहीं चलता है - यह भी नहीं कि कुछ नहीं है। यह ध्यान की चौथी अवस्था है, इससे पहले की तीन अवस्थाओं में इंद्रियों द्वारा महसूस की गई बात, कल्पना की गई बात और शून्य महसूस किया जाता है। इसका ...

                                               

बृहदारण्यक उपनिषद्

बृहदारण्यक उपनिषत् शुक्ल यजुर्वेद से जुड़ा एक उपनिषद है। अद्वैत वेदांत और संन्यासनिष्ठा का प्रतिपादक है। उपनिषदों में सर्वाधिक बृहदाकार इसके ६ अध्याय, ४७ ब्राह्मण और प्रलम्बित ४३५ पदों का शांति पाठ ऊँ पूर्णमद: इत्यादि है और ब्रह्मा इसकी संप्रदाय ...

                                               

ब्रह्मविद्या उपनिषद

ब्रह्मविद्या उपनिषद कृष्ण यजुर्वेद के अन्तर्गत आने वाले ३२ उपनिषदों में से एक है। इसमें ब्रह्मविद्या की शिक्षा है। इसमें मुख्यतः ॐ की संरचना, इसका उच्चारण, इसकी स्थिति, इसका आदि और अन्त तथा इसका महत्व प्रतिपादित किया गया है।

                                               

अहं ब्रह्मास्मि

उपनिषदों के चार महावाक्यों में से एक महावाक्य है - "अहं ब्रह्मास्मि"। महावाक्य पूरे अध्यामिक शास्त्रों का निचोड़ है। उपनिषद् अध्यात्मिक शास्त्र के प्रमाण ग्रंथ हैं। अहं ब्रह्मास्मि का सरल अर्थ है अहं ब्रह्म अस्मि। अर्थात मैं ब्रह्म हूँ। वैदिक संस ...

                                               

महा उपनिषद

महोपनिषद एक लघु उपनिषद् है। यह वैष्ण्व उपनिषद की श्रेणी में आता है। महोपनिषद सामवेदिय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यत वेदव्यास जी को कई उपनिषदों का ...

                                               

मुक्तिका उपनिषद्

मुक्तिका एक उपनिषद है जिसमें १०८ उपनिषदों की सूची दी गयी है। किसी भी उपनिषद का रचनाकाल ठीक-ठीक पता नहीं है। सब्से पुराने उपनिषदों की रचना ईसा से लगभग ८०० वर्ष पूर्व हुई थी। सभी मुख्य उपनिषदों की रचना पहली सहस्राब्दी ईसापूर्व में हो गयी थी। अधिकां ...

                                               

मुख्य उपनिषद

उपनिषदों की संख्या लगभग २०० है जिनमें से प्रायः १३ उपनिषदों को मुख्य उपनिषद् कहा जाता है। मुख्य उपनिषद, वे उपनिषद हैं जो प्राचीनतम हैं और जिनका पठन-पाठन अधिक हुआ है। इनका रचनाकाल ८०० ईसापूर्व से लेकर ईशवी सन के आरम्भ तक माना जाता है। भारत में अंग ...

                                               

मुण्डकोपनिषद्

मुंडकोपनिषद् दो-दो खंडों के तीन मुंडकों में, अथर्ववेद के मंत्रभाग के अंतर्गत आता है। इसमें पदार्थ और ब्रह्म-विद्या का विवेचन है, आत्मा-परमात्मा की तुलना और समता का भी वर्णन है। इसके मंत्र सत्यमेव जयते ना अनृतम का प्रथम भाग, यानि सत्ममेव जयते भारत ...

                                               

वाजश्रवसपुत्र नचिकेता

नचिकेता, वैदिक युग के एक तेजस्वी ऋषिबालक थे। इनकी कथा तैतरीय ब्राह्मण तथा कठोपनिषद् तथा महाभारत में उपलब्ध होती है। उन्होने भौतिक वस्तुओं का परित्याग किया तथा यम से आत्मा और ब्रह्म विषय पर ज्ञान प्राप्त किया। नचिकेता उद्दालक ऋषि के पुत्र थे जिन्ह ...

                                               

अपरा विद्या

उपनिषद् की दृष्टि में अपरा विद्या निम्न श्रेणी का ज्ञान मानी जाती हैं। मुण्डक उपनिषद के अनुसार विद्या दो प्रकार की होती है- 1 परा विद्या श्रेष्ठ ज्ञान जिसके द्वारा अविनाशी ब्राह्मतत्व का ज्ञान प्राप्त होता है सा परा, यदा तदक्षरमधिगम्यते, 2 अपरा व ...

                                               

संन्यास उपनिषद

संन्यास उपनिषद् वे उपनिषद् हैं जो संन्यास से सम्बन्धित हैं। मुक्तिका उपनिषद् में वर्णित १०८ उपनिषदों में से १९ उपनिषद सन्यास उपनिषद की श्रेणी में हैं, जो निम्नलिखित हैं- बृहत्संन्यास उपनिषद् जबाल उपनिषद् तुरियातीतवधूत उपनिषद् परमहंस परिव्राजक उपन ...

                                               

सूर्योपनिषद

सूर्योपनिषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यत वेदव्यास जी को कई उपनिषदों का लेखक माना जाता है।

                                               

ह्यग्रीव उपनिषद

ह्यग्रीव उपनिषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इसके रचियता वैदिक काल के ऋषियों को माना जाता है परन्तु मुख्यतः वेदव्यास जी को कई उपनिषदों का लेखक माना जाता है।

                                               

दायित्व

अगर किसी के पास कोई अधिकार है, तो वह तब तक उसका उपभोग नहीं कर सकता जब तक दूसरा एक दायित्व के रूप में उस अधिकार का आदर न करे। इस लिहाज़ से अधिकाऔर दायित्व एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। व्यक्तिगत अधिकारों को तभी तक जारी रखा जा सकता है जब तक राज्य की ...

                                               

पश्चिमीकरण

पश्चिमीकरण का अर्थ पश्चिमी देशों अर्थात योरोप और अमरीका की संस्कृति को स्वीकार करना। इसमें उन देशों का खाना-पीना, पोशाक, रहन-सहन आदि आदि शामिल हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि पाश्चात्य संस्कृति के सभी तत्व पश्चिम में उत्पन्न नहीं हुए हैं । उदाहरण के ल ...

                                               

मानदण्डक नीतिशास्त्र

मानदण्डक नीतिशास्त्र नीतिशास्त्रीय कार्य का अध्ययन हैं। यह दार्शनिक नीतिशास्त्र की शाखा हैं, जो उन प्रश्नों को जाँचती हैं, जिनका उद्गम यह सोचते वक़्त होता हैं कि नैतिक तौपर किसी को कैसे कार्य करना चाहियें। इसकी व्युपत्ति मानदण्डक से हुई, जिसका सम ...

                                               

अकलंक

अकलंक, जैन न्यायशास्त्र के अनेक मौलिक ग्रंथों के लेखक आचार्य। अकलंक ने भर्तृहरि, कुमारिल, धर्मकीर्ति और उनके अनेक टीकाकारों के मतों की समालोचना करके जैन न्याय को सुप्रतिष्ठित किया है। उनके बाद होने वाले जैन आचार्यों ने अकलंक का ही अनुगमन किया है। ...

                                               

अनेकांतवाद

अनेकान्तवाद जैन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और मूलभूत सिद्धान्तों में से एक है। मौटे तौपर यह विचारों की बहुलता का सिद्धान्त है। अनेकावान्त की मान्यता है कि भिन्न-भिन्न कोणों से देखने पर सत्य और वास्तविकता भी अलग-अलग समझ आती है। अतः एक ही दृष्टिकोण से ...

                                               

अपरिग्रह

अपरिग्रह गैर-अधिकार की भावना, गैर लोभी या गैर लोभ की अवधारणा है, जिसमें अधिकारात्मकता से मुक्ति पाई जाती है।। यह विचार मुख्य रूप से जैन धर्म तथा हिन्दू धर्म के राज योग का हिस्सा है। जैन धर्म के अनुसार "अहिंसा और अपरिग्रह जीवन के आधार हैं"। अपरिग् ...

                                               

ईर्यापथ आस्रव

ईर्यापथ आस्रव, जैनमत में वर्णित आस्रव का एक भेद है। मन, वचन और काया की सहायता से आत्मप्रदेशों में गति होना जैन धर्म में योग कहलाता है और इसी योग के माध्यम से आत्मा में कर्म की पुद्गलवर्गणाओं का जो संबंध होता है उसे आस्रव कहते हैं। आस्रव के दो भेद ...