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मूलसर्वास्तिवाद

मूलसर्वास्तिवाद भारत का एक प्राचीन आरम्भिक बौद्ध दर्शन है। इस दर्शन की उत्पत्ति के बारे में तथा इसका सर्वास्तिवादी सम्प्रदाय से सम्बन्ध के बारे में प्रायः कुछ भी ज्ञात नहीं है। फिर भी, इसके बारे में कई सिद्धान्त मौजूद हैं। मूलसर्वास्तिवादी सम्प्र ...

                                               

योगाचार

योगाचार बौद्ध दर्शन एवं मनोविज्ञान का एक प्रमुख शाखा है। यह भारतीय महायान की उपशाखा है जो चौथी शताब्दी में अस्तित्व में आई। योगाचार्य इस बात की व्याख्या करता है कि हमारा मन किस प्रकार हमारे अनुभवों की रचना करता है। योगाचार दर्शन के अनुसार मन से ब ...

                                               

शून्यता

शून्यवाद या शून्यता बौद्धों की महायान शाखा माध्यमिक नामक विभाग का मत या सिद्धान्त है जिसमें संसार को शून्य और उसके सब पदार्थों को सत्ताहीन माना जाता है । "माध्यमिक न्याय" ने "शून्यवाद" को दार्शनिक सिद्धांत के रूप में अंगीकृत किया है। इसके अनुसार ...

                                               

सर्वास्तिवाद

सर्वास्तिवाद, बौद्ध दर्शन का एक सम्प्रदाय था जिनका मत था कि तीनों कालों में संसार की सभी वस्तुओं का अस्तित्व है। सर्वास्तिवाद को वैभाषिक भी कहते हैं। तृतीय संगीति के बाद से भारत में सर्वास्तिवाद, थेरवाद से अलग हो गया तथा थेरवाद का ह्रास और सर्वास ...

                                               

हेतुचक्र

हेतुचक्र एक दार्शनिक संस्कृत ग्रन्थ है जिसके रचयिता दिग्नाग हैं। इसमें त्रैरूप्य का वर्णन है। अनाकर Anacker 2005: p. 34, ने वासुबन्धु के वाद-विधि Method for Argumentation नामक संस्कृत ग्रन्थ का परिचय कराते हुए लिखा है- Vasubandhus criteria for a ...

                                               

ब्रह्माण्डविद्या

ब्रह्माण्डविद्या या कॉस्मोलॉजी खगोल विज्ञान की एक शाखा है, जिसमें ब्रह्माण्ड से जुड़ी तमाम बातों का अध्ययन किया जाता है। इसमें ब्रह्माण्ड के बनने की प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी दी जाती है। बीसवीं शताब्दी में आए वैज्ञानिक बदलावों ने वैज्ञानिक ...

                                               

हिंदू धर्म में कर्म

कर्म हिंदू धर्म की वह अवधारणा है, जो एक प्रणाली के माध्यम से कार्य-कारण के सिद्धांत की व्याख्या करती है, जहां पिछले हितकर कार्यों का हितकर प्रभाव और हानिकर कार्यों का हानिकर प्रभाव प्राप्त होता है, जो पुनर्जन्म का एक चक्र बनाते हुए आत्मा के जीवन ...

                                               

अक्षपाद गौतम

Ancient Nyayasutras first ten sutras in Sanskrit.jpg अक्षपाद, न्यायसूत्र के रचयिता आचार्य। प्रख्यात न्यायसूत्रों के निर्माता का नाम पद्मपुराण उत्तर खंड, अध्याय 263, स्कंदपुराण तथा विश्वनाथ की न्यायवृत्ति में महर्षि गोतम या गौतम ठहराया गया है। इसक ...

                                               

अज्ञान

अज्ञान - वस्तु के ज्ञान का अभाव। अज्ञान दो प्रकार का हो सकता है- एक वस्तु के ज्ञान का अत्यंत अभाव, जैसे सामने रखी वस्तु को न देखना; दूसरा वस्तु के वास्तविक स्वरूप के स्थान पर दूसरी वस्तु का ज्ञान। प्रथम अभावात्मक और दूसरा भावात्मक ज्ञान है। इंद्र ...

                                               

अज्ञान (सम्प्रदाय)

अज्ञान प्राचीन भारतीय दर्शन का एक दार्शनिक सम्प्रदाय था जो नास्तिक था। यह एक श्रमण आन्दोलन था जो प्रारम्भिक जैन धर्म और बौद्ध धर्म का प्रतिद्वन्द्वी था। इनका उल्लेख अनेकों जैन और बौद्ध ग्रन्थों में मिलता है।

                                               

अदृष्ट

नैयायिकों के अनुसार कर्मों द्वारा उत्पन्न फल दो प्रकार का होता है। अच्छे कार्यों के करने से एक प्रकार की शोभन योग्यता उत्पन्न होती है जिसे पुण्य कहते हैं। बुरे कामों के करने से एक प्रकार की अशोभन योग्यता उत्पन्न होती है जिसे पाप कहते हैं। पुण्य औ ...

                                               

अध्यारोपापवाद

अध्यारोपापवाद) अद्वैत वेदांत में आत्मतत्व के उपदेश की वैज्ञानिक विधि। ब्रह्म के यथार्थ रूप का उपदेश देना अद्वैमत के आचार्य का प्रधान लक्ष्य है। ब्रह्म है स्वयं निष्प्रपंच और इसका ज्ञान बिना प्रपंच की सहायता के किसी प्रकार भी नहीं कराया जा सकता। इ ...

                                               

अनुपलब्धि

भारतीय दर्शन के सन्दर्भ में, अनुपलब्धि या अभावप्रमाण एक प्रमाण है। इसे पूर्वमीमांसा में कुमारिल भट्ट सम्प्र्दाय ने एक प्रमाण माना है। पूर्वमीमांसा ने इसके अतिरिक्त पाँच अन्य प्रमाण माने हैं, जो ये हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान, तथा अर्थापत्ति

                                               

अनुमान

अनुमान, दर्शन और तर्कशास्त्र का पारिभाषिक शब्द है। भारतीय दर्शन में ज्ञानप्राप्ति के साधनों का नाम प्रमाण हैं। अनुमान भी एक प्रमाण हैं। चार्वाक दर्शन को छोड़कर प्राय: सभी दर्शन अनुमान को ज्ञानप्राप्ति का एक साधन मानते हैं। अनुमान के द्वारा जो ज्ञ ...

                                               

अनेकान्तिक हेतु

अनेकांतिक हेतु, हेत्वाभास का एक भेद है जिसे सव्यभिचार भी कहते हैं। अनुमान में हेतु को साध्य की अपेक्षा कम स्थानों पर किंतु साध्य के साथ रहना चाहिए। यदि हेतु ऐसा नहीं है तो वह अनेकांतिक है। इस अवस्था में हेतु या तो साध्य से अलग रहता है, या केवल उस ...

                                               

अन्यथानुपपत्ति

अन्यथानुपपत्ति का अर्थ है - किसी अत्यायश्यक कारण के बिना। किसी तथ्य के अनेक कारण होते हैं किंतु उनमें से कोई एक कारण सर्वप्रधान होता है। अन्य कारणों के रहते हुए भी इस प्रधान कारण के बिना कार्य की उत्पति संभव नहीं होती। इस प्रधान कारण के अभाव में ...

                                               

अप्रमा

प्रमा से विपरीत अनुभव को अप्रमा कहते हैं अर्थात्‌ किसी वस्तु में किसी गुण का अनुभव जिसमें वह गुण विद्यमान ही नहीं रहता। न्यायमत में ज्ञान दो प्रकार का होता है। संस्कार मात्र से उत्पन्न होनेवाला ज्ञान स्मृति कहलाता है तथा स्मृति से भिन्न ज्ञान अनु ...

                                               

अभाव

अभाव का सामान्य अर्थ है - किसी वस्तु का न होना। कुमारिल भट्ट के अनुसार अभावज्ञान प्रत्यक्ष से नहीं होता क्योंकि वहाँ विषयेंद्रियसंबंध नहीं है। अभाव के साथ लिंग की व्याप्ति नहीं होती, अत: अनुमान भी नहीं हो सकता। अभाव ज्ञान के लिए मीमांसा में अनुपल ...

                                               

अर्थवाद

अर्थवाद भारतीय पूर्वमीमांसा दर्शन का विशेष पारिभाषिक शब्द, जिसका अर्थ है प्रशंसा, स्तुति अथवा किसी कार्यात्मक उद्देश्य को सिद्ध कराने के लिए॰इधर उधर की बातें जो कार्य सम्पन्न करने में प्रेरक हों। पूर्वसीमांसा दर्शन में वेदों के-जिनको वह अपौरुषेय, ...

                                               

अर्थसंग्रह

अर्थसंग्रह मीमांसा का एक लघुकाय प्रकरण ग्रन्थ है, जिसमें शाबरभाष्य में प्रतिपादित बहुत से विषयों का अतिसंक्षेप में निरूपण है। संक्षेप में अधिकतम विषयों को प्रस्तुत करने के कारण इस ग्रन्थ का प्रचार जिज्ञासु-सामान्य में अत्यधिक हुआ और उपयोगी होने प ...

                                               

अर्थापत्ति

मीमांसा दर्शन में अर्थापत्ति एक प्रमाण माना गया है। यदि कोई व्यक्ति जीवित है किंतु घर में नहीं है तो अर्थापत्ति के द्वारा ही यह ज्ञात होता है कि वह बाहर है। प्रभाकर के अनुसार अर्थापत्ति से तभी ज्ञान संभव है जब घर में अनुपस्थित व्यक्ति के संबंध मे ...

                                               

अलातशांति

लकड़ी आदि को प्रज्वलित कर चक्राकार घुमाने पर अग्नि के चक्र का भ्रम होता है। यदि लकड़ी की गति को रोक दिया जाए तो चक्राकार अग्नि का अपने आप नाश हो जाता है। बौद्ध दर्शन और वेदांत में इस उपमा का उपयोग मायाविनाश के प्रतिपादन के लिए किया गया है। माया क ...

                                               

अविद्या

अविद्या, विद्या का विलोम शब्द है। भारतीय धर्मों में अविद्या का अर्थ है- अज्ञान, गलत धारणा। हिन्दू ग्रन्थों में अविद्या का बार-बार प्रयोग हुआ है। ब्रह्म ज्ञान से इतर ज्ञान को भी अविद्या कहा गया है। आजकल जिसे विज्ञान कहा जाता है, उसे भी अविद्या कहा ...

                                               

अव्यक्त

अव्यक्त शब्द का प्रयोग प्रकृति तथा ब्रह्म के लिये किया जाता है। ॐ:- अव्यक्त अर्थात्‌ जो व्यक्त नहिं है अव्यक्त प्रकृति, पुरुष, ब्रह्म के लिय प्रयोग होता है वेद कहते है की। सृष्टि पूर्व में अपने कारण अवस्था में लिन थी अर्थात अव्यक्त थी वह इस अवस्थ ...

                                               

असत्‌कार्यवाद

असत्‌कार्यवाद कारणवाद का न्यायदर्शनसम्मत सिद्धांत जिसके अनुसार कार्य उत्पत्ति के पहले नहीं रहता। न्याय के अनुसार उपादान और निमित्त कारण अलग-अलग कार्य उत्पन्न करने की पूर्ण शक्ति नहीं है किंतु जब ये कारण मिलकर व्यापारशील होते हैं तब इनकी सम्मिलित ...

                                               

अहिंसा

अहिंसा का सामान्य अर्थ है हिंसा न करना। इसका व्यापक अर्थ है - किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से कोई नुकसान पहुँचाना। मन में किसी का अहित न सोचना, किसी को कटुवाणी आदि के द्वार भी नुकसान देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी ...

                                               

आत्मज्ञान

आत्मज्ञामन के भीतर की जागरूपता है। भारतीय दर्शन में इसका प्रतीक शिव, विष्णु अथवा शक्ति हैं। इसका वर्णन बहुत वेद और उपनिषद में मिलता है। वैदिक परम्परा के अनुसार इस परम्परा का गूढ रहस्य चेतना अथवा आत्मज्ञान विज्ञान है।

                                               

आत्मबोध

आत्मबोध का शाब्दिक अर्थ है, स्वयं को जानना। प्राचीन भारत की शिक्षा में इसका बहुत बड़ा प्रभाव था। आत्मबोध, आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक लघु ग्रन्थ का नाम भी है। वेदान्त के मूल ग्रन्थों का अध्ययन आरम्भ करने की पूर्वतैयारी के रूप में शंकराचार्य ने ...

                                               

आभासवाद

आभासवाद त्रिक दर्शन की दार्शनिक दृष्टि का अभिधान है। कश्मीर का त्रिक दर्शन अद्वैतवादी है। इसके अनुसार परमशिव जो "अनुत्तर", "संविद्" आदि अनेक नामों से प्रख्यात हैं अपनी स्वातंत्रयशक्ति से जो उनकी इच्छाशक्ति का ही अपर नाम है अपने भीतर स्थित होनेवाल ...

                                               

आरम्भवाद

आरंभवाद - कार्य संबंधी न्यायशास्त्र का सिद्धांत। कारणों से कार्य की उत्पत्ति होती है। उत्पत्ति के पहले कार्य नहीं होता। यदि कार्य उत्पत्ति के पहले रहता तो उत्पादन की आवश्यकता ही न होती। इसी सार्वजनीन अनुभव के आधापर न्यायशास्त्र में उत्पन्न कार्य ...

                                               

ईश्वर (भारतीय दर्शन)

ईश्वर शब्द भारतीय दर्शन तथा अध्यात्म शास्त्रों में जगत् की सृष्टि, स्थिति और संहारकर्ता, जीवों को कर्मफलप्रदाता तथा दु:खमय जगत् से उनके उद्धारकर्ता के अर्थ में प्रयुक्त होता है। कभी-कभी वह गुरु भी माना गया है। न्यायवैशेषिकादि शास्त्रों का प्राय: ...

                                               

ईश्वरकृष्ण

ईश्वरकृष्ण एक प्रसिद्ध सांख्य दर्शनकार थे। इनका काल विवादग्रस्त है। डॉ॰ तकाकुसू के अनुसार उनका समय ४५० ई. के लगभग और डॉ॰ वि. स्मिथ के अनुसार २४० ई. के आसपास होना चाहिए। यह प्राय: निश्चित है कि वे बौद्ध दार्शनिक वसुबंधु के गुरु के समकालीन एवं प्रत ...

                                               

उच्छेदवाद

उच्छेदवाद आत्मा के भी नष्ट हो जाने का सिद्धांत है। प्राचीन काल में अजित केशकंबली के सिद्धांत को उच्छेदवाद के नाम से जाना जाता था। इस सिद्धांत के अनुसार मृत्यु के बाद कोई भी पदार्थ स्थायी नहीं रहता। शरीरस्थ सभी पदार्थों के अस्थायित्व में विश्वास क ...

                                               

उत्तरमीमांसा

उत्तरमीमांसा छः भारतीय दर्शनों में से एक। उत्तरमीमांसा को शारीरिक मीमांसा और वेदान्त दर्शन भी कहते हैं। ये नाम बादरायण के बनाए हुए ब्रह्मसूत्र नामक ग्रन्थ के हैं। मीमांसा शब्द का अर्थ है अनुसन्धान, गंभीर विचार, खोज। प्राचीन भारत में वेदों को परम ...

                                               

उपजीव्य-उपजीवक

किसी वस्तु की उपपत्ति के लिए जो अपेक्षणीय है, वह उपजीव्य है तथा जो अपेक्षा करे वह उपजीवक है। अर्थात् जिस पर निर्भर रहा जाए वह उपजीव्य है और जो निर्भर रहे वह उपजीवक है। जैसे, प्रत्यक्ष के बिना अनुमान नहीं हो सकता, इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण अनुमान प्र ...

                                               

उपादान

किसी वस्तु की तृष्णा से उसे ग्रहण करने की जो प्रवृत्ति होती है, उसे उपादान कहते हैं। प्रतीत्यसमुत्पादन की दूसरी कड़ी तण्हापच्चया उपादानं - इसी का प्रतिपादान करती है। उपादान से ही प्राणी के जीवन की सारी भाग दोड़ होती है, जिसे भव कहते हैं। तृष्णा क ...

                                               

उपाधि

न्यायशास्त्र के पारिभाषिक शब्द अन्वय और व्यतिरेक के आधापर साथ रहनेवाली वस्तुओं में एक को हेतु और दूसरे को साध्य माना जाता है। कभी-कभी अन्वय-व्यतिरेक में दोष हो जाने के कारण हम वास्तविक हेतु की जगह दूसरे को हेतु मान लेते हैं। ऐसा हेतु उपाधि कहलाता ...

                                               

ऊर्जा चिकित्सा

ब्रह्मांड के सकारात्मक चिकित्सकीय ऊर्जा किरणों को साधना/एकाग्रता के द्वारा प्राप्त करना और उसका अपने जरूरत के अनुसार उपयोग करना ही ऊर्जा चिकित्सा का सीधा और सरल सा अर्थ है। ऊर्जा चिकित्सा के बारे में सर्वप्रथम जानकारी किसे, कब, कहाँ किन परिस्थिति ...

                                               

एकजीववाद

एकजीववाद सिद्धांत के अनुसार वेदांत में एक ही जीव की स्थिति मानी जाती है। अविद्या एक है, अत: अविद्या से आवृत्त जीव भी एक होगा। इस वाद के कई रूप शंकर के परवर्ती अद्वैत वेदांत में मिलते हैं। कुछ लोगों के अनुसार एक ही जीव एक ही शरीर में रहता है। अन्य ...

                                               

एकेश्वरवाद

एकेश्वरवाद वह सिद्धान्त है जो ईश्वर एक है अथवा एक ईश्वर है विचार को सर्वप्रमुख रूप में मान्यता देता है। एकेश्वरवादी एक ही ईश्वर में विश्वास करता है और केवल उसी की पूजा-उपासना करता है। इसके साथ ही वह किसी भी ऐसी अन्य अलौकिक शक्ति या देवता को नहीं ...

                                               

कणाद

कणाद एक ऋषि थे। स्वतंत्र भौतिक विज्ञानवादी दर्शन प्रकार के आत्मदर्शन के विचारों का सबसे पहले महर्षि कणाद ने सूत्र रूप में लिखा। ये "उच्छवृत्ति" थे और धान्य के कणों का संग्रह कर उसी को खाकर तपस्या करते थे। इसी लिए इन्हें "कणाद" या "कणभुक्" कहते थे ...

                                               

कषाय

भारतीय दर्शन में कषाय शब्द का प्रयोग विशेष रूप से राग, द्वेष आदि दोषों के लिए हुआ है। छांदोग्य उपनिषद के अनुसार मृदित कषाय जिनका कषाय नष्ट हो गया है नारद को भगवान् सनत्कुमार ने अविद्यारूपा तम के पार परमार्थतत्व को दिखलाया। शंकराचार्य के मत से ज्ञ ...

                                               

काम

काम, जीवन के चार पुरुषार्थों में से एक है। प्रत्येक प्राणी के भीतर रागात्मक प्रवृत्ति की संज्ञा काम है। वैदिक दर्शन के अनुसार काम सृष्टि के पूर्व में जो एक अविभक्त तत्व था वह विश्वरचना के लिए दो विरोधी भावों में आ गया। इसी को भारतीय विश्वास में य ...

                                               

कूटस्थ

कूटस्थ, भारतीय दर्शन में आत्मा, पुरुष, ब्रह्म तथा ईश्वर के लिए प्रयुक्त शब्द। यह परम सत्ता के स्वरूप को व्यक्त करता है। कूटस्थ का अर्थ है कूट का अधिष्ठान अथवा आधार। जो वस्तु ऊपर से अच्छी प्रतीत होती है किंतु अंदर से दोषपूर्ण है, उसे कूट कहते हैं। ...

                                               

केवलान्वयी

केवलान्वयी, न्यायदर्शन में एक प्रकार का विशेष अनुमान है। यहाँ हेतु, साध्य के साथ सर्वदा सत्तात्मक रूप से ही संबद्ध रहता है। न्यायदर्शन के अनुसार व्याप्ति दो प्रकार से हो सकती है- अन्वयमुखेन तथा व्यतिरेकमुखेन। अन्वय का अर्थ है- तत्सत्त्वे तत्सत्ता ...

                                               

क्लेश

योगदर्शन के अनुसार अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश पाँच क्लेश हैं। । भाष्यकर व्यास ने इन्हें विपर्यय कहा है और इनके पाँच अन्य नाम बताए हैं- तम, मोह, महामोह, तामिस्और अंधतामिस्र । इन क्लेशों का सामान्य लक्षण है - कष्टदायिकता। इनके रहते आ ...

                                               

गुण (भारतीय संस्कृति)

गुण शब्द का कई अर्थों में व्यवहार होता है। सामान्य बोलचाल की भाषा में वस्तु की उत्कर्षाधायक विशेषता को गुण कहते हैं। प्रधान के विपरीत अर्थ में भी गुण शब्द का प्रयोग होता है। रस्सी को भी गुण कहते हैं।

                                               

चतुष्कोटि

चतुष्कोटि एक तार्किक कथन है जिसमें चार विविक्त फलन होते हैं। इसका अनेकों कार्यों के लिये उपयोग किया गया है। भारतीय तर्कशास्त्र की परम्परा में यह बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। चतुष्कोटि के अनुसार, कोई कथन निम्नलिखित चार चतुः में से कोई एक ही हो स ...

                                               

चित्त

स्रौत विज्ञान मनोविज्ञान घ्राण विज्ञान काय विज्ञान चक्षु विज्ञान जिह्वा विज्ञान

                                               

ज्ञान (भारतीय)

भारतीय धर्मों में ज्ञान का अर्थ इसके सामान्य अर्थ से कुछ भिन्न है। उदाहरण के लिए जब हम कहते हैं कि महात्मा बुद्ध को बड़ी तपस्या के बाद ज्ञान की प्राप्ति हुई तो इसका अर्थ विशेष ज्ञान से है।