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उपन्यास - साहित्य. अर्नेस्ट ए. बेकर ने उपन्यास की परिभाषा देते हुए उसे गद्यबद्ध कथानक के माध्यम द्वारा जीवन तथा समाज की व्याख्या का सर्वोत्तम साधन बताया है। ..




                                               

डेविड कॉपरफील्ड (उपन्यास)

डेविड कॉपरफील्ड या ब्लंडरस्टोन की बस्ती में रहने वाले डेविड कॉपरफील्ड का व्यक्तिगत इतिहास, रोमांच, अनुभव और समीक्षा चार्ल्स डिकेन्स द्वारा लिखित एक उपन्यास है, जो एक उपन्यास के रूप में सबसे पहले 1850 में प्रकाशित हुआ था। उनके अधिकांश कार्यों की तरह, यह मूल रूप से एक वर्ष पहले धारावाहिक के रूप में आया। उपन्यास में कई तत्व डिकेन्स के खुद के जीवन की घटनाओं पर आधारित हैं और यह संभवतः उनके सभी उपन्यासों में सबसे अधिक आत्मकथा पर आधारित है. 1867 चार्ल्स डिकेन्स संस्करण के लिए प्रस्तावना में उन्होंने लिखा है, ". कई शौकीन अभिभावकों की तरह, मेरे दिल में एक पसंदीदा बच्चा है। और उसका नाम डेविड कॉपरफील ...

                                               

ड्यून (उपन्यास)

ड्यून अमेरिकी लेखक फ़्रैंक हर्बर्ट द्वारा सन् १९६५ में प्रकाशित विज्ञान कथा उपन्यास है। १९६६ में इसने ह्यूगो पुरस्कार जीता और १९६६ में नॅब्युला पुरस्कार जीता: यह दोनों ही हर साल छपने वाली सर्वश्रेष्ठ विज्ञान कथा को दिए जाते हैं। ड्यून की १.२ करोड़ से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं और इसे विश्व का सब से ज़्यादा बिकने वाला विज्ञान कथा उपन्यास माना जाता है। इसके प्रकाशन के बाद फ़्रैंक हर्बर्ट ने इसकी कथा को पाँच और ड्यून उपन्यासों में आगे बढ़ाया।

                                               

एमा

एमा, यह जेन ऑस्टेन द्वारा लिखित रोमांस के ग़लत अर्थों से पैदा होने वाले संकटों के बारे में एक उपन्यास है। यह उपन्यास दिसंबर 1815 में पहले-पहल प्रकाशित किया गया था। अपने अन्य उपन्यासों की ही तरह, इस उपन्यास में भी ऑस्टेन इंग्लॅण्ड के जोर्जियन-रीजेंसी में रहनेवाली कुलीन महिलाओं के जीवन की मुश्किलों और चिंताओं का अन्वेषण करतीं हैं; साथ ही वे अपने पात्रों के ज़रिये एक सजीव शिष्टाचार-प्रहसन भी प्रस्तुत करतीं हैं। उपन्यास शुरू करने से पहले ऑस्टेन ने लिखा, "में एक ऐसी नायिका चुनने वाली हूं जिसे कोई और नहीं बल्कि में खुद सबसे ज़्यादा पसंद करूंगी." पहले ही वाक्य में उन्होंने शीर्षक पात्र को "सुन्दर ...

                                               

दामोदर खडसे

डॉक्टर दामोदर खडसे) मराठी साहित्यकार हैं जो मराठी पुस्तकों का हिन्दी अनुवाद करने के लिए प्रसिद्ध हैं। इन्होंने हिंदी के माध्यम से कंप्यूटर एवं बैंकिंग के प्रशिक्षण को सुगम बनाने के लिए हिंदी को एक व्यापकता प्रदान की है। हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु अखिल भारतीय स्तर पर डॉक्टर दामोदर खडसे ने जहाँ बैंकिंग एवं तकनीकी शब्दावली का निर्माण किया, वहीं सृजनात्मक स्तर पर इन्होंने उपन्यास लेखन और साहित्य अकादमी के लिए मराठी से हिंदी में महत्वपूर्ण रचनाओं का अनुवाद भी किया। वे महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष भी हैं। इनके द्वारा लिखे गये लेख, कहानियाँ, कविताएँ, उपन्यास तथा अ ...

                                               

बलदेव सिंह (लेखक)

बलदेव सिंह पंजाबी उपन्यासकार एवं कहानीकार हैं जिन्हें सन २०११ में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होने सन २०१२ में ही ५५ से अधिक उपन्यासों, कहानियों एवं नाटकों की रचना कर दी थी।

                                               

नन्दिनी घोषाल

नंदिनी घोषाल एक भारतीय बंगाली शास्त्रीय नृत्यांगना, कोरियोग्राफर और अभिनेत्री हैं। १९९७ की ड्रामा फिल्म चार अधिया में अपने अभिनय की शुरुआत करने के बाद, नंदिनी ने कई बंगाली फिल्मों में प्रमुख भूमिका निभाई, जैसे कि किछु संलप किछु प्रलाप और सिथी ।

उपन्यास
                                     

उपन्यास

अर्नेस्ट ए. बेकर ने उपन्यास की परिभाषा देते हुए उसे गद्यबद्ध कथानक के माध्यम द्वारा जीवन तथा समाज की व्याख्या का सर्वोत्तम साधन बताया है। यों तो विश्वसाहित्य का प्रारंभ ही संभवत: कहानियों से हुआ और वे महाकाव्यों के युग से आज तक के साहित्य का मेरुदंड रही हैं, फिर भी उपन्यास को आधुनिक युग की देन कहना अधिक समीचीन होगा। साहित्य में गद्य का प्रयोग जीवन के यथार्थ चित्रण का द्योतक है। साधारण बोलचाल की भाषा द्वारा लेखक के लिए अपने पात्रों, उनकी समस्याओं तथा उनके जीवन की व्यापक पृष्ठभूमि से प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करना आसान हो गया है। जहाँ महाकाव्यों में कृत्रिमता तथा आदर्शोन्मुख प्रवृत्ति की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है, आधुनिक उपन्यासकार जीवन की विशृंखलताओं का नग्न चित्रण प्रस्तुत करने में ही अपनी कला की सार्थकता देखता है।

यथार्थ के प्रति आग्रह का एक अन्य परिणाम यह हुआ कि कथा साहित्य के अपौरुषेय तथा अलौकिक तत्व, जो प्राचीन महाकाव्यों के विशिष्ट अंग थे, पूर्णतया लुप्त हो गए। कथाकार की कल्पना अब सीमाबद्ध हो गई। यथार्थ की परिधि के बाहर जाकर मनचाही उड़ान लेना उसके लिए प्राय: असंभव हो गया। उपन्यास का आविर्भाव और विकास वैज्ञानिक प्रगति के साथ हुआ। एक ओर जहाँ विज्ञान ने व्यक्ति तथा समाज को सामन्य धरातल से देखने तथा चित्रित करने की प्ररेणा दी वहीं दूसरी ओर उसने जीवन की समसयाओं के प्रति एक नए दृष्टिकोण का भी संकेत किया। यह दृष्टिकोण मुख्यत: बौद्धिक था। उपन्यासकार के ऊपर कुछ नए उत्तरदायित्व आ गए थे। अब उसकी साधना कला की समस्याओं तक ही सीमित न रहकर व्यापक सामाजिक जागरूकता की अपेक्षा रखती थी। वस्तुत: आधुनिक उपन्यास सामाजिक चेतना के क्रमिक विकास की कलात्मक अभिव्यक्ति है। जीवन का जितना व्यापक एवं सर्वांगीण चित्र उपन्यास में मिलता है उतना साहित्य के अन्य किसी भी रूप में उपलब्ध नहीं।

सामाजिक जीवन की विशद व्याख्या प्रस्तुत करने के साथ ही साथ आधुनिक उपन्यास वैयक्तिक चरित्र के सूक्ष्म अध्ययन की भी सुविधा प्रदान करता है। वास्तव में उपन्यास की उत्पत्ति की कहानी यूरोपीय पुनरुत्थान रेनैसाँ के फलस्वरूप अर्जित व्यक्तिस्वातंत्रय के साथ लगी हुई है। इतिहास के इस महत्वपूर्ण दौर के उपरांत मानव को, जो अब तक समाज की इकाई के रूप में ही देखा जाता था, वैयक्तिक प्रतष्ठा मिली। सामंतवादी युग के सामाजिक बंधन ढीले पड़े और मानव व्यक्तित्व के विकास के लिए उन्मुक्त वातावरण मिला। यथार्थोन्मुख प्रवृत्तियों ने मानव चरित्र के अध्ययन के लिए भी एक नया दृष्टिकोण दिया। अब तक के साहित्य में मानव चरित्र के सरल वर्गीकरण की परंपरा चली आ रही है। पात्र या तो पूर्णतया भले होते थे या एकदम गए गुजरे। अच्छाइयों और त्रुटियों का सम्मिश्रण, जैसा वास्तविक जीवन में सर्वत्र देखने को मिलता है, उस समय के कथाकारों की कल्पना के परे की बात थी। उपन्यास में पहली बार मानव चरित्र के यथार्थ, विशद एवं गहन अध्ययन की संभावना देखने को मिली।

अंग्रेजी के महान्‌ उपन्यासकार हेनरी फ़ील्डिंग ने अपनी रचनाओं को गद्य के लिखे गए व्यंग्यात्मक महाकाव्य की संज्ञा दी। उन्होंने उपन्यास की इतिहास से तुलना करते हुए उसे अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण कहा। जहाँ इतिहास कुछ विशिष्ट व्यक्तियों एवं महत्वपूर्ण घटनाओं तक ही सीमित रहता है, उपन्यास प्रदर्शित जीवन के सत्य, शाश्वत और संर्वदेशीय महत्व रखते हैं। साहित्य में आज उपन्यास का वस्तुत: वही स्थान है जो प्राचीन युग में महाकाव्यों का था। व्यापक सामाजिक चित्रण की दृष्टि से दोनों में पर्याप्त साम्य है। लेकिन जहाँ महाकाव्यों में जीवन तथा व्यक्तियों का आदर्शवादी चित्र मिलता है, उपन्यास, जैसा फ़ील्डिंग की परिभाषा से स्पष्ट है, समाज की आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करता है। उपन्यासकार के लिए कहानी साधन मात्र है, साध्य नहीं। उसका ध्येय पाठकों का मनोरंजन मात्र भी नहीं। वह सच्चे अर्थ में अपने युग का इतिहासकार है जो सत्य और कल्पना दोनों का सहारा लेकर व्यापक सामाजिक जीवन की झाँकी प्रस्तुत करता है।

                                     

1. हिंदी साहित्य में उपन्यास

हिंदी साहित्य में उपन्यास शब्द के प्रथम प्रयोग के संदर्भ में गोपाल राय लिखते हैं कि- "हिन्दी में नॉवेल के अर्थ में उपन्यास पद का प्रथम प्रयोग 1875 ई. में हुआ।"

                                     

2. प्रथम उपन्यास

बाणभट्ट की कादम्बरी को विश्व का प्रथम उपन्यास माना जा सकता है। कुछ लोग जापानी भाषा में 1007 ई. में लिखा गया" जेन्जी की कहानी” नामक उपन्यास को दुनिया का सबसे पहला उपन्यास मानते हैं। इसे मुरासाकी शिकिबु नामक एक महिला ने लिखा था। इसमें 54 अध्याय और करीब 1000 पृष्ठ हैं। इसमें प्रेम और विवेक की खोज में निकले एक राजकुमार की कहानी है।

यूरोप का प्रथम उपन्यास सेर्वैन्टिस का" डोन क्विक्सोट” माना जाता है जो स्पेनी भाषा का उपन्यास है। इसे 1605 में लिखा गया था।

अंग्रेजी का प्रथम उपन्यास होने के दावेदार कई हैं। बहुत से विद्वान 1678 में जोन बुन्यान द्वारा लिखे गए" द पिल्ग्रिम्स प्रोग्रेस” को पहला अंग्रेजी उपन्यास मानते हैं।

                                     

3. भारतीय भाषाओं में उपन्यास

जिसे बँगला और हिंदी में उपन्यास कहा जाता है गोपाल राय के अनुसार उसे "उर्दू में नाविल, मराठी में कादम्बरी तथा गुजराती में नवल कथा की संज्ञा प्राप्त हुई है।"

हिन्दी का प्रथम उपन्यास

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार परीक्षा गुरु हिन्दी का प्रथम उपन्यास है। इसके लेखकलाला श्रीनिवास दास हैं। देवरा नी जेठानी की कहानी लेखक - पंडित गौरीदत्त ; सन् १८७०। श्रद्धाराम फिल्लौरी की भाग्यवती को भी हिन्दी के प्रथम उपन्यास होने का श्रेय दिया जाता है।

मलयालम

इंदुलेखा - रचनाकाल, 1889, लेखक चंदु मेनोन

तमिल

प्रताप मुदलियार - रचनाकाल 1879, लेखक, मयूरम वेदनायगम पिल्लै

बंगाली

दुर्गेशनंदिनी - रचनाकाल, 1865, लेखक, बंकिम चंद्र चटर्जी

मराठी

यमुना पर्यटन - रचनाकाल, 1857, लेखक, बाबा पद्मजी।

इसे भारतीय भाषाओं में लिखा गया प्रथम उपन्यास माना जाता है।

इस तरह हम देख सकते हैं कि भारत की लगभग सभी भाषाओं में उपन्यास विधा का उद्भव लगभग एक ही समय दस-बीस वर्षों के अंतराल में हुआ।